नाना पाटेकर: संघर्ष से शिखर तक का सफर, घर गिरवी रखकर बनाई ‘अंकुश’, आग में झुलसे फिर भी नहीं रुके
कभी 16 किलोमीटर पैदल चलकर पोस्टर रंगते थे, पिता की दवा के पैसे नहीं थे; ‘परिंदा’ के क्लाइमैक्स में झुलसी त्वचा, कारगिल में सेना के साथ भी रहे
रिंकू यादव -अनप्लग इंडिया। डेस्क
दिल्ली/मुंबई। नाना पाटेकर का नाम सिर्फ एक अभिनेता के तौर पर नहीं लिया जाता। उनकी पहचान उस कलाकार की रही, जिसने पर्दे पर किरदार निभाने के बजाय उसे जीने की कोशिश की। कभी गरीबी ने उन्हें सड़क पर पोस्टर रंगने के लिए मजबूर किया, कभी फिल्मों में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा और कभी अपने भरोसे पर घर तक गिरवी रखना पड़ा।
करीब पांच दशक के फिल्मी सफर में उन्होंने ‘गमन’, ‘अंकुश’, ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘तिरंगा’, ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों में अलग-अलग रंग के किरदार निभाए। अभिनय के साथ उनका जुड़ाव थिएटर से भी गहरा रहा।
गुरुवार को 75 वर्ष की उम्र में उनके निधन की खबर सामने आई। गोवा के डोना पाउला स्थित घर पर कार्डियक अरेस्ट के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें बचाने की कोशिश की गई, लेकिन वे नहीं बच सके।
नाना का असली नाम विश्वनाथ गजानन पाटेकर था। 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में जन्मे नाना का बचपन आसान नहीं था। लेकिन शायद यही मुश्किलें आगे चलकर उनके अभिनय की सबसे बड़ी ताकत बनीं।
13 साल की उम्र में कमाई के लिए पोस्टर रंगने लगे
नाना जब करीब 13 साल के थे, तब उनके परिवार पर आर्थिक संकट टूट पड़ा। उनके पिता टेक्सटाइल पेंटिंग का छोटा कारोबार करते थे। एक धोखे के बाद कारोबार बर्बाद हो गया और परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि संपत्ति तक बेचनी पड़ी।
नाना को पढ़ाई के साथ काम करना पड़ा। दिन में स्कूल जाने के बाद वह फिल्मों के पोस्टर रंगते थे। काम की जगह घर से करीब 8 किलोमीटर दूर थी। यानी रोजाना करीब 16 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था।
इस काम के बदले उन्हें महीने में लगभग 35 रुपये मिलते थे।
आर्थिक तंगी का आलम यह था कि कई बार खाने के भी पैसे नहीं होते थे। वह लंच या डिनर के समय दोस्तों के आसपास इस उम्मीद में पहुंच जाते कि शायद कोई उन्हें खाने के लिए बुला ले।
शरारत इतनी कि शिक्षक पास बैठाकर रखते थे
बचपन में नाना बेहद शरारती थे। उनकी हरकतों से परेशान शिक्षक उन्हें अपने पास बैठाकर रखते थे, ताकि जरूरत पड़ने पर उन्हें नियंत्रित करने के लिए बार-बार अपनी जगह से उठना न पड़े।
उनकी मां ने भी एक समय उन्हें छठी कक्षा के बाद अपनी बहन के गांव भेज दिया। उम्मीद थी कि माहौल बदलने से नाना की शरारतें कम होंगी। लेकिन कुछ समय बाद वह वापस आ गए।
बचपन की यही बेबाकी आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की पहचान बन गई।
खुद को हीरो के लायक नहीं मानते थे
नाना को अपने रूप-रंग को लेकर भी हीनभावना थी। उन्हें लगता था कि उनके दोनों भाई उनसे ज्यादा अच्छे दिखते हैं और पिता भी उन्हें अधिक पसंद करते हैं।
लेकिन अभिनय के प्रति उनका आत्मविश्वास अलग था।
गांव में होने वाले नाटकों में वह हिस्सा लेते थे। एक बार नाना के अभिनय को देखने उनके पिता मुंबई से गांव तक आए। उस घटना ने नाना के मन में पिता को लेकर बनी एक पुरानी गलतफहमी को खत्म कर दिया।
उन्हें लगा कि अगर उनका अभिनय पिता को प्रभावित कर सकता है, तो वह अपनी कला से दूसरों तक भी पहुंच सकते हैं।
पिता के लिए कमाई का एक रुपया भी नहीं दे पाए
नाना के जीवन में आर्थिक संघर्ष का एक दर्द ऐसा भी रहा जिसे वह लंबे समय तक याद करते रहे।
उनके पिता गंभीर रूप से बीमार हुए और अस्पताल में भर्ती रहे। उस समय नाना के पास उनकी दवाइयों के लिए भी पर्याप्त पैसे नहीं थे। दोस्तों ने उनकी मदद की।
बाद में नाना ने इस बात का अफसोस जताया था कि वह अपनी कमाई का एक रुपया भी पिता के हाथ पर नहीं रख पाए।
‘आज की आवाज’ में रेपिस्ट का रोल मिला तो भड़क गए
अभिनय में शुरुआती दौर में ही नाना के तेवर साफ नजर आने लगे थे।
एक समय अभिनेत्री स्मिता पाटिल ने उन्हें निर्देशक रवि चोपड़ा से मिलने के लिए कहा। रवि चोपड़ा अपनी फिल्म ‘आज की आवाज’ पर काम कर रहे थे। उन्होंने नाना को रेपिस्ट का किरदार ऑफर किया।
किरदार सुनते ही नाना नाराज हो गए। उन्होंने साफ शब्दों में इस भूमिका पर आपत्ति जताई। बाद में स्मिता पाटिल ने दोनों के बीच बातचीत कराई और नाना को फिल्म में मुख्य खलनायक की भूमिका मिली।
लेकिन नाना ने एक शर्त रखी—किरदार को वह अपनी समझ के मुताबिक तैयार करेंगे।
‘परिंदा’ के सेट पर निर्देशक से भिड़ंत, उसी झगड़े के बाद मिला यादगार सीन
1989 की फिल्म ‘परिंदा’ नाना के करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में रही। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा और नाना के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों में हाथापाई तक हो गई।
विवाद के बीच नाना शूटिंग छोड़कर जाने लगे। इसी दौरान निर्देशक ने उनका कुर्ता फाड़ दिया।
संयोग देखिए, कुछ ही देर बाद कैमरा तैयार था और नाना को एक भावुक दृश्य करना था। वह दृश्य फिल्म में बनियान पहने नाना के रूप में नजर आया। बताया जाता है कि वह शॉट उसी तनावपूर्ण घटना के तुरंत बाद शूट हुआ था।
बाद में दोनों के बीच मामला शांत हुआ और नाना ने निर्देशक को गले लगा लिया।
क्लाइमैक्स में असली आग ने झुलसा दिया
‘परिंदा’ के क्लाइमैक्स में नाना को आग की लपटों के बीच दिखाया गया था। उस दौर में आज जैसी कृत्रिम आग की तकनीक आसानी से उपलब्ध नहीं थी, इसलिए शूटिंग में वास्तविक आग का इस्तेमाल किया गया।
निर्देशक ने नाना को सुरक्षा कवच पहनने की सलाह दी थी। नाना का मानना था कि अगर शरीर पूरी तरह ढका रहा तो दृश्य की स्वाभाविकता प्रभावित होगी।
शूटिंग के दौरान आग की लपटें उनके शरीर तक पहुंच गईं। उनके हाथ-पैर बुरी तरह झुलस गए और त्वचा तक उतर गई। हालत गंभीर होने पर उन्हें मुंबई के नानावटी अस्पताल में भर्ती कराया गया।
इस हादसे के बाद वह करीब एक साल तक फिल्मों से दूर रहे।
अभिनय से अलग सेना से भी जुड़ा गहरा रिश्ता
नाना बचपन से ही सेना में जाने की इच्छा रखते थे। 1991 की फिल्म ‘प्रहार’ में उन्होंने सैनिक की भूमिका निभाई और इसके लिए उन्होंने सैन्य प्रशिक्षण भी लिया।
उनका सेना से जुड़ाव सिर्फ फिल्मी पर्दे तक सीमित नहीं रहा। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान वह भारतीय सेना के साथ करीब दो महीने रहे।
बताया गया कि उन्होंने सेना के एक अधिकारी से संपर्क कर सेना के साथ काम करने की इच्छा जताई थी। जब बात आगे नहीं बढ़ी तो उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से संपर्क किया। अनुमति मिलने के बाद वह सेना से जुड़े।
कारगिल में वह क्विक रिएक्शन टीम का हिस्सा रहे। वहां जाने के दौरान उनका वजन करीब 76 किलो बताया गया था, जबकि दो महीने बाद वह करीब 56 किलो रह गए थे।
निर्माता से बोले- खाना खा लिया तो अब बर्तन भी साफ करो
नाना के व्यक्तित्व की बेबाकी के कई किस्से फिल्म इंडस्ट्री में सुनाए जाते रहे हैं।
अभिनेता परेश रावल ने एक इंटरव्यू में ऐसा ही एक किस्सा सुनाया था। उनके मुताबिक नाना ने एक फिल्म निर्माता को घर बुलाया और उन्हें खाना खिलाया। खाना खत्म होने के बाद नाना ने निर्माता से कहा कि अब बर्तन भी साफ कर दीजिए।
परेश रावल ने नाना की इसी बेबाक शैली को याद करते हुए उन्हें अलग मिट्टी का कलाकार बताया था।
इसी संदर्भ में यह भी बताया गया कि नाना ऐसे शुरुआती कैरेक्टर कलाकारों में रहे, जिन्होंने अपने अभिनय के लिए उस दौर में बेहद बड़ी फीस की मांग की थी।
‘अंकुश’ पूरी करने के लिए अपना घर गिरवी रख दिया
नाना पाटेकर के करियर में 1986 की फिल्म ‘अंकुश’ बेहद महत्वपूर्ण रही।
निर्देशक एन. चंद्रा ने उन्हें फिल्म में करीब 10 हजार रुपये की फीस पर साइन किया था। शुरुआत में 3 हजार रुपये एडवांस मिले थे और बाकी रकम फिल्म बिकने के बाद मिलने वाली थी।
नाना उस पैसे से स्कूटर खरीदने का सपना देख रहे थे।
लेकिन फिल्म बनते-बनते निर्माता के पैसे खत्म हो गए और शूटिंग रुकने की स्थिति आ गई। नाना को कहानी और निर्देशक पर इतना भरोसा था कि उन्होंने अपना घर गिरवी रखकर करीब 2 लाख रुपये का इंतजाम किया।
इसी पैसे से फिल्म का काम आगे बढ़ा और ‘अंकुश’ पूरी हो सकी।
फिल्म रिलीज हुई तो सफल रही। इसके साथ नाना को भी बड़ी पहचान मिली। बाद में निर्देशक एन. चंद्रा ने नाना का गिरवी रखा घर छुड़ाने में मदद की और उन्हें वह स्कूटर भी दिया, जिसका सपना उन्होंने फिल्म साइन करते समय देखा था।
थिएटर में विलेन बने तो दर्शक जूते फेंकने लगे
नाना का थिएटर करियर भी उतना ही प्रभावशाली था।
नाटक ‘पुरुष’ में उन्होंने करीब 16 साल काम किया और लगभग 1,800 शो किए। इस नाटक में उनका किरदार इतना नकारात्मक था कि कई बार दर्शक प्रदर्शन के दौरान उन पर जूते तक फेंक देते थे।
नाना इन जूतों को अपमान नहीं बल्कि अपने अभिनय की सफलता मानते थे। वह उन्हें सम्मान के तौर पर संभालकर रखते थे।
‘तिरंगा’ के सेट पर राज कुमार को खिलाई घर की सब्जी
फिल्म ‘तिरंगा’ के दौरान नाना और राज कुमार से जुड़ा एक किस्सा भी चर्चित रहा।
नाना घर से केले के फूल की सब्जी बनवाकर सेट पर लेकर आए थे। राज कुमार ने उसे खाया और उसे कीमे की सब्जी समझ बैठे।
जब नाना ने बताया कि यह केले के फूल की सब्जी है, तब भी राज कुमार ने मजाकिया अंदाज में उसे कीमा ही कहा।
फिल्म में दोनों कलाकारों की जोड़ी दर्शकों को खूब पसंद आई। राज कुमार ने ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह और नाना ने इंस्पेक्टर शिवजीराव वागले का किरदार निभाया था।
1993 के मुंबई ब्लास्ट में भाई को खोया
नाना की जिंदगी का सबसे दर्दनाक अध्याय 1993 के मुंबई बम धमाकों से जुड़ा रहा।
इन धमाकों में उन्होंने अपने भाई को खो दिया। जिस बस में उनके भाई सफर कर रहे थे, उसमें विस्फोट हुआ। शव की हालत ऐसी थी कि पहचान करना मुश्किल था।
उनके भाई हाथ में कड़ा पहनते थे। उसी कड़े के जरिए परिवार ने शव की पहचान की।
इस घटना को लेकर एक और संयोग सामने आया। नाना की पत्नी भी उसी समय यात्रा कर रही थीं और जिस बस में वह बैठी थीं, उसके पीछे वाली बस में उनके भाई सवार हुए थे।
पर्दे पर सख्त, निजी जिंदगी में अलग इंसान
नाना पाटेकर के व्यक्तित्व में कई विरोधाभास एक साथ दिखाई देते थे। पर्दे पर वह कभी पुलिस अधिकारी बने, कभी खलनायक, कभी सैनिक तो कभी आम आदमी की भूमिका में नजर आए। लेकिन हर किरदार में उनकी अपनी एक अलग छाप रही।
गरीबी से निकला यह कलाकार अपने शुरुआती दिनों की मुश्किलों को कभी नहीं भूला। पोस्टर रंगने से लेकर थिएटर के मंच, फिल्मों के सेट और सेना के कैंप तक उनका सफर आसान नहीं था।
नाना पाटेकर की सबसे बड़ी पहचान शायद यही रही कि उन्होंने अभिनय को केवल पेशा नहीं माना—उन्होंने हर किरदार को अपने संघर्ष, अनुभव और तेवर से एक अलग जीवन दिया।
नाना पाटेकर का सफर एक नजर में
- जन्म: 1 जनवरी 1951, मुरुड-जंजीरा, महाराष्ट्र
- असली नाम: विश्वनाथ गजानन पाटेकर
- शुरुआत: थिएटर
- प्रमुख फिल्में: अंकुश, परिंदा, क्रांतिवीर, तिरंगा, अब तक छप्पन, अपहरण, वेलकम
- सेना से जुड़ाव: ‘प्रहार’ के दौरान सैन्य प्रशिक्षण और कारगिल में सेवा
- थिएटर: ‘पुरुष’ के करीब 1,800 शो
- निधन: 8 अक्टूबर 2026, 75 वर्ष की उम्र में
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