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12 अक्तूबर 2026 | भरोसेमंद खबरें, सीधे आपके शहर से
अंक: 12 Oct 2026
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गुरुग्राम में युवराज हत्याकांड: अज्ञात शव मानकर कर दिया अंतिम संस्कार, जांच की 3 बड़ी चूकों पर पुलिस-डॉक्टर घेरे में

Rinku Yadav • • 7 मिनट पढ़ें
गुरुग्राम में युवराज हत्याकांड: अज्ञात शव मानकर कर दिया अंतिम संस्कार, जांच की 3 बड़ी चूकों पर पुलिस-डॉक्टर घेरे में

छह दिन तक ZIPNET पर अपलोड नहीं हुई शव की जानकारी; पोस्टमॉर्टम में मौत की वजह डूबना बताई गई, दिल्ली पुलिस की जांच में गोली मारकर हत्या का मामला सामने आया

अनप्लग इंडिया। डेस्क

गुरुग्राम। हरियाणा के गुरुग्राम में रियल एस्टेट कंपनी के 31 वर्षीय मैनेजर युवराज सिंह मनचंदा की हत्या के मामले में पुलिस और मेडिकल जांच प्रक्रिया की गंभीर चूक सामने आई है। युवराज का शव 10 सितंबर को बादशाहपुर के पास एक नाले में मिला था, लेकिन शुरुआत में उसे अज्ञात शव मानकर कार्रवाई की गई। पुलिस ने 14 सितंबर को अंतिम संस्कार भी करा दिया। बाद में सामने आया कि युवराज की मौत डूबने से नहीं, बल्कि गोली लगने से हुई थी।

मामले में मृतक की बहन हरसिमरन मनचंदा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। दिए गए समाचार विवरण के अनुसार, अदालत में मामला पहुंचने के बाद जांच प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठे। इसके बाद बादशाहपुर थाने के एसएचओ राजेश को निलंबित कर दिया गया। पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर, फॉरेंसिक टीम और अन्य संबंधित कर्मियों के खिलाफ भी विभागीय जांच शुरू किए जाने की जानकारी सामने आई है।

6 सितंबर को लापता हुए थे युवराज, चार दिन बाद मिला शव

युवराज सिंह मनचंदा एक रियल एस्टेट कंपनी में सेल्स मैनेजर के पद पर काम करते थे। वह 6 सितंबर को लापता हो गए थे। 10 सितंबर को गुरुग्राम पुलिस को उनका शव बादशाहपुर के पास एक नाले में मिला।

शुरुआत में शव की पहचान नहीं हो सकी। पुलिस ने उसे अज्ञात मानते हुए आगे की प्रक्रिया पूरी की और 14 सितंबर को अंतिम संस्कार करा दिया। बाद में पता चला कि शव युवराज का था। इस दौरान दिल्ली के लाजपत नगर थाने में उनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज थी।

परिवार के लिए सबसे बड़ी पीड़ा यह रही कि शव की पहचान समय पर नहीं होने के कारण वे अपने परिजन को अंतिम बार देख नहीं सके। मामले में यह सवाल भी उठा कि जब युवराज की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज थी, तब शव की पहचान के लिए संबंधित थानों और दूसरे राज्यों की पुलिस के बीच समन्वय क्यों नहीं हो पाया।

पहली बड़ी चूक: शव मिलने के छह दिन बाद ZIPNET पर दर्ज हुई जानकारी

अज्ञात शव मिलने पर उसकी तस्वीरें, कपड़ों का विवरण और पहचान से जुड़े अन्य संकेत संबंधित पुलिस नेटवर्क पर अपलोड करना महत्वपूर्ण होता है। इससे दूसरे राज्यों की पुलिस और लापता लोगों की तलाश कर रहे परिवारों को जानकारी मिल सकती है।

इस मामले में आरोप है कि युवराज का शव 10 सितंबर को मिलने के बावजूद उसकी जानकारी ZIPNET पर 16 सितंबर तक अपलोड नहीं की गई। यानी इस प्रक्रिया में करीब छह दिन की देरी हुई।

समय पर जानकारी दर्ज होती तो दिल्ली में दर्ज गुमशुदगी की रिपोर्ट और गुरुग्राम में मिले शव के बीच संबंध स्थापित करने में मदद मिल सकती थी। इस देरी ने पुलिस की कार्यप्रणाली और दोनों स्थानों की पुलिस के बीच समन्वय को लेकर सवाल खड़े किए।

दूसरी चूक: फॉरेंसिक जांच में गोली के निशान नहीं पहचाने जाने का आरोप

मामले में दूसरी गंभीर चूक फॉरेंसिक जांच से जुड़ी बताई गई है। शुरुआती जांच में मौत की वजह डूबना मानी गई, जबकि बाद की जांच में गोली मारकर हत्या किए जाने का मामला सामने आया।

समाचार में दी गई जानकारी के अनुसार, शव की स्थिति को देखते हुए जांच में अतिरिक्त सावधानी की जरूरत थी। आरोप है कि फॉरेंसिक टीम शरीर पर मौजूद गोली के निशानों को पहचान नहीं सकी और मौत के कारण को लेकर शुरुआती निष्कर्ष पर ही कार्रवाई आगे बढ़ गई।

इस मामले में फॉरेंसिक टीम की डॉ. रिचा शर्मा और उनके सहयोगियों की भूमिका की विभागीय जांच किए जाने की जानकारी दी गई है। जांच का उद्देश्य यह स्पष्ट करना होगा कि शुरुआती परीक्षण में महत्वपूर्ण संकेत क्यों छूट गए और जांच प्रक्रिया में कहां कमी रही।

तीसरी चूक: पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत की वजह डूबना बताई गई

तीसरा बड़ा सवाल पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को लेकर उठा है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर डॉ. मानव चौहान ने शुरुआती रिपोर्ट में मौत की वजह डूबना बताई थी। इसी रिपोर्ट के आधार पर जांच अधिकारी ने आगे की कार्रवाई की।

बाद में दिल्ली पुलिस की जांच में हत्या का मामला सामने आया और युवराज को गोली मारे जाने की बात उजागर हुई। इसके बाद शुरुआती मेडिकल निष्कर्षों की विश्वसनीयता पर सवाल उठे।

डॉ. मानव चौहान के खिलाफ विभागीय जांच शुरू होने की जानकारी दी गई है। हालांकि, किसी अधिकारी की लापरवाही या जानबूझकर गलत रिपोर्ट देने का अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही निकाला जा सकेगा।

दिल्ली पुलिस की जांच में सामने आए आन्या और संयम के नाम

युवराज की हत्या के मामले में दिल्ली पुलिस की तकनीकी जांच अहम साबित हुई। उपलब्ध समाचार विवरण के अनुसार, युवराज की पूर्व सहकर्मी आन्या वत्स और उसके साथी संयम सचदेवा के नाम सामने आए। दोनों को उत्तराखंड से गिरफ्तार किया गया था।

पुलिस के मुताबिक, पूछताछ के दौरान पैसों के विवाद में युवराज की गोली मारकर हत्या किए जाने की बात सामने आई। बताया गया कि युवराज को दो गोलियां मारी गई थीं। इस खुलासे ने शुरुआती जांच में मौत की वजह डूबना बताए जाने पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

इस घटनाक्रम के बाद मामले की शुरुआती जांच करने वाले अधिकारियों और मेडिकल तथा फॉरेंसिक टीम की भूमिका पर नए सिरे से ध्यान गया।

एसएचओ निलंबित, डॉक्टर और फॉरेंसिक टीम की जांच

मामले में उठे सवालों के बाद बादशाहपुर थाने के एसएचओ राजेश को निलंबित किए जाने की जानकारी दी गई है। वहीं, पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर डॉ. मानव चौहान, फॉरेंसिक टीम की डॉ. रिचा शर्मा और उनके सहयोगियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई है। पुलिस कंट्रोल रूम की एक महिला उपनिरीक्षक की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई गई है।

जांच में यह देखा जाएगा कि अज्ञात शव की पहचान करने, उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने और दूसरी पुलिस इकाइयों से संपर्क स्थापित करने में किन स्तरों पर चूक हुई। वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की भी पड़ताल किए जाने की बात सामने आई है।

सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने के बाद बढ़ी गंभीरता

युवराज की बहन हरसिमरन मनचंदा ने मामले को सुप्रीम कोर्ट में उठाया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, सुनवाई के दौरान शुरुआती पुलिस और मेडिकल जांच की कमियों पर गंभीर सवाल उठे।

मामले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि बाद में दिल्ली पुलिस की जांच में हत्या का खुलासा नहीं होता, तो शुरुआती रिपोर्ट के आधार पर मौत को दुर्घटना मानकर मामला बंद होने की आशंका थी। अदालत में उठे सवालों ने यह मुद्दा सामने रखा कि अज्ञात शव की पहचान और मौत के कारण की जांच में किसी भी स्तर की चूक पूरे आपराधिक मामले को प्रभावित कर सकती है।

हालांकि, पुलिसकर्मियों या डॉक्टरों ने जानबूझकर साक्ष्य छिपाए या नष्ट किए, इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष विभागीय जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।

जांच प्रक्रिया पर उठे बड़े सवाल

युवराज मनचंदा हत्याकांड में सामने आए घटनाक्रम ने पुलिस और मेडिकल जांच की जवाबदेही को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। इनमें प्रमुख हैं:

  • अज्ञात शव की जानकारी संबंधित पुलिस नेटवर्क पर समय से क्यों नहीं डाली गई?
  • दिल्ली में दर्ज गुमशुदगी की रिपोर्ट के बावजूद शव की पहचान पहले क्यों नहीं हो सकी?
  • शुरुआती फॉरेंसिक जांच में गोली के निशानों की पहचान क्यों नहीं हुई?
  • पोस्टमॉर्टम में मौत की वजह डूबना बताए जाने के बाद जांच को उसी दिशा में क्यों आगे बढ़ाया गया?
  • जांच की निगरानी और संबंधित विभागों के बीच समन्वय में कहां कमी रही?

इन सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद सामने आ सकेंगे। फिलहाल, इस मामले में हत्या के आरोपियों की गिरफ्तारी के साथ-साथ शुरुआती जांच में हुई कथित लापरवाही की जिम्मेदारी तय करना भी महत्वपूर्ण है।

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