रेवड़ी नहीं, अधिकार चाहिए: प्रजा नहीं- नागरिक बनिए!
प्रमोद पंत
अहिंसा की राजनीति का एक कार्यकर्ता
“सरकार ने हमें क्या दिया?”
यह सवाल चुनावों और राजनीतिक बहसों में अक्सर सुनाई देता है।
लेकिन लोकतंत्र में इससे भी बड़ा सवाल है –
“सरकार ने हमें क्या दिया नहीं, बल्कि हमें नागरिक होने के नाते क्या मिलना चाहिए?”
यहीं से ‘फ्री-बी/ रेवड़ी’ और ‘नागरिक हक’ के बीच फर्क समझने की जरूरत पैदा होती है।
किसी गरीब परिवार को मुफ्त राशन मिले, किसान को आर्थिक सहायता मिले, महिला को गैस कनेक्शन मिले या किसी जरूरतमंद को पेंशन—ये सभी अपने-आप में गलत नहीं हैं। असली सवाल यह है कि लाभ किस उद्देश्य से दिया जा रहा है, उसका आधार क्या है और क्या वह व्यक्ति को आत्मनिर्भर तथा अधिकार-संपन्न बना रहा है?
प्रजा और नागरिक में क्या अंतर है?
प्रजा शब्द में एक पुराने शासन की तस्वीर दिखाई देती है- राजा ऊपर है प्रजा नीचे। राजा देता है, प्रजा प्राप्त करती है और बदले में वफादारी की अपेक्षा की जाती है।
नागरिक की स्थिति अलग है
लोकतंत्र में नागरिक केवल सरकार से लेने वाला व्यक्ति नहीं है। वह अधिकारों का धारक, कर्तव्यों का पालन करने वाला और सरकार को जवाबदेह बनाने वाला व्यक्ति है।
सरल भाषा में हम इसे समझ सकते हैं….
| प्रजा की मानसिकता | नागरिक की मानसिकता |
|---|---|
| राज्य/सरकार क्या देगी? | कानून के अनुसार मेरा क्या अधिकार है |
| कृपा की अपेक्षा | कानून के अनुसार अधिकार |
| सरकार से डर | सरकार से सवाल |
| लाभ पाने की कोशिश | व्यवस्था को जवाबदेह बनाना |
| चुनाव के समय याद | हर दिन लोकतांत्रिक भागीदारी |
| “सरकार ने दिया” | “यह मेरा नागरिक अधिकार है” |
लोकतंत्र में नागरिक केवल सरकार से लेने वाला व्यक्ति नहीं है। वह अधिकारों का धारक, कर्तव्यों का पालन करने वाला और सरकार को जवाबदेह बनाने वाला व्यक्ति है।
गांधीजी का ‘स्वराज’: सरकार पर निर्भरता नहीं, नागरिक की शक्ति
महात्मा गांधी के लिए स्वराज का अर्थ केवल अंग्रेजों को देश से बाहर करना नहीं था।
उन्होंने कहा कि वास्तविक स्वराज तब आएगा जब आम आदमी में इतनी क्षमता हो कि वह सत्ता के दुरुपयोग का विरोध और सत्ता को नियंत्रित कर सके। गांधी के अनुसार स्वराज कुछ लोगों के हाथ में सत्ता हासिल करने का नाम नहीं, बल्कि जनता की क्षमता बढ़ाने का नाम है।
गांधीजी का एक महत्वपूर्ण विचार था कि अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे से जुड़े हैं। उनके अनुसार नागरिक केवल अधिकार मांगने का नाम नहीं, नागरिक अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए समाज और राज्य के प्रति जिम्मेदारी भी निभाता है।
इसलिए गांधी के स्वराज में सवाल केवल यह नहीं था-
“सरकार मुझे क्या देगी”?
बल्कि यह भी था-
“मैं अपने गांव, समाज और देश के लिए क्या करूंगा और सरकार से उसके काम का हिसाब कैसे मांगूंगा”?
अम्बेडकर की दृष्टि: अधिकार केवल कागज पर नहीं, वास्तविक होने चाहिए
डॉं. भीमराव अम्बेडकर ने लोकतंत्र को केवल चुनाव की व्यवस्था नहीं माना। उनके विचारों में सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों की समझ तथा उनका वास्तविक उपयोग महत्वपूर्ण था। भारत सरकार के डॉं. अम्बेडकर प्रतिष्ठान के संकलन में उनका यह विचार दर्ज है कि केवल असंतोष पर्याप्त नहीं, राजनीति और सामाजिक अधिकारों की न्यायसंगतता, आवश्यकता और महत्व की गहरी समझ भी जरूर है।
यानी नागरिक को यह पता होना चाहिए कि-
सरकार से मिलने वाली सुविधा और संविधान/कानून से मिलने वाला अधिकार एक ही चीज नहीं हैं।
‘फ्री-बी’ या ‘रेवड़ी’ क्या है?
‘फ्रीबी’ कोई कानूनी श्रेणी नहीं है। यह सार्वजनिक बहस में इस्तेमाल होने वाला शब्द है।
आमतौर पर ऐसी योजनाओं के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है जिनमें सरकार किसी व्यक्ति या समूह को मुफ्त या बहुत कम कीमत पर कोई वस्तु, सेवा या आर्थिक लाभ देती है।
उदाहरण के लिए-
• मुफ्त या अत्यधिक सब्सिडी वाली बिजली-पानी
• मुफ्त वस्तुएं
• नकद सहायता
• चुनावी घोषणा के रूप में विशेष आर्थिक लाभ
• कुछ वर्गों के लिए मुफ्त यात्रा या अन्य सुविधाएं
लेकिन हर मुफ्त सुविधा को ‘रेवड़ी’ कहना भी सही नहीं होगा।
गरीब को भोजन उपलब्ध कराना, बुजुर्ग को सामाजिक सुरक्षा देना या गर्भवती महिला को मातृत्व सहायता देना-इनके पीछे सार्वजनिक कल्याण का उद्देश्य हो सकता है।
इसलिए किसी योजना को समझने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि “मुफ्त है या नहीं”।
यह देखना चाहिए-
किसके लिए? क्यों? किस कानून/नीति के तहत? कितने समय के लिए? और उसका सामाजिक उद्देश्य क्या है?
नागरिक हक की योजना क्या है?
नागरिक हक या कानूनी गारंटी वाली योजना में नागरिक को किसी कानून या स्थापित सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर अधिकार या सेवा प्राप्त होती है।
उदाहरण:
मनरेगा
ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार की कानूनी गारंटी का ढांचा।
सूचना का अधिकार
सरकारी व्यवस्था से सूचना मांगने का कानूनी अधिकार।
शिक्षा का अधिकार
6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा का कानूनी अधिकार।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून
कानून के तहत निर्धारित पात्र आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा का ढांचा।
यहां नागरिक केवल यह नहीं कहता-
“सरकार मुझे कुछ दे दो”।
वह कह सकता है-
“कानून के अनुसार मेरा अधिकार है, इसलिए मुझे यह सेवा/सुविधा क्यों नहीं मिली”?
यही प्रजा और नागरिक के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर हैं।
एक आसान उदाहरण: राशन और रोजगार
मान लीजिए सरकार गरीब परिवार को मुफ्त राशन देती है।
यह सामाजिक सुरक्षा का उपाय हो सकता है।
लेकिन यदि उसी परिवार के वयस्क सदस्य को काम चाहिए और कानून रोजगार की गारंटी देता है, तो सवाल अलग है-
“मुझे मुफ्त अनाज कब मिलेगा”? के साथ-साथ
“मुझे काम का अवसर और मजदूरी कब मिलेगी”?
यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।
राशन भूख से बचाता है, लेकिन रोजगार व्यक्ति को आय और सम्मान के साथ जीने की क्षमता देता है।
तो क्या हर मुफ्त योजना गलत है? बिल्कुल नहीं।
यह समझना बहुत जरूरी है।
एक गरीब वृद्ध को पेंशन देना,
गरीब परिवार को खाद्य सुरक्षा देना,
दिव्यांग व्यक्ति को सहायता देना,
बच्चे को पोषण देना,
गर्भवती महिला को मातृत्व सहायता देना—
इनका उद्देश्य कमजोर व्यक्ति को न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा देना हो सकता है।
समस्या तब पैदा होती है जब कल्याण, अधिकार और राजनीतिक घोषणा के बीच का अंतर समाप्त हो जाए।
इसलिए किसी भी योजना को तीन सवालों से परखना चाहिए—
क्या यह राहत है?
तत्काल कठिनाई से बचाने के लिए।
क्या यह अधिकार है?
कानून या सार्वजनिक व्यवस्था के तहत मिलने वाली गारंटी।
क्या यह निवेश है?
शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल, रोजगार, सिंचाई, सड़क, डिजिटल कनेक्टिविटी जैसी चीजें जो भविष्य की क्षमता बढ़ाती हैं।
जनता को क्या मांगना चाहिए?
जनता को केवल यह नहीं पूछना चाहिए-
“हमें क्या मुफ्त मिलेगा”?
जनता को चाहिए वह सरकार से पूछे-
• रोजगार कहां है?
• अच्छी और सस्ती शिक्षा कहां है?
• गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा कहां है?
• किसान को उचित बाजार और उचित मूल्य कैसे मिलेगा?
• सरकारी कार्यालय में मेरा काम समय पर क्यों नहीं होता?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल-
“सरकार मेरे पैसे का हिसाब कब देगी”?
यही सवाल नागरिक को लाभार्थी से भागीदार बनाता है।
प्रजा मत बनिए, जागरूक नागरिक बनिए
किसी नेता के हाथ से मिलने वाली चीज देखकर केवल यह मत पूछिए-
“मुझे क्या मिला?”
यह भी पूछिए-
“मेरा अधिकार क्या है?”
“सरकार ने यह पैसा कहाँ से लिया?”
“इस योजना का कानून क्या है?”
“इसका लाभ किसे और क्यों मिल रहा है?”
“क्या इससे मेरी आने वाली पीढ़ी मजबूत होगी?”
और सबसे जरूरी—
“क्या मैं सरकार का लाभार्थी हूं या लोकतंत्र का जागरूक नागरिक?”
गांधी का स्वराज हमें सत्ता का केवल उपभोक्ता नहीं, सत्ता को जवाबदेह बनाने वाला नागरिक बनने की दिशा दिखाता है। लोकतंत्र की असली सफलता इस बात में नहीं है कि सरकार ने जनता को कितनी चीजें मुफ्त दीं।
असली सफलता तब है जब देश का गरीब भी कह सके—
“मैं किसी की कृपा पर नहीं, अपने अधिकार और सम्मान के साथ जीता हूं।
और जब जनता यह कहने लगे—
“सरकार हमारी मालिक नहीं—हमारे प्रति जवाबदेह संस्था है।
तभी प्रजा से नागरिक और शासन से स्वराज की यात्रा पूरी होती है।
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