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अंक: 12 Oct 2026
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SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CEC ज्ञानेश कुमार को तत्काल हटाने से इनकार, आयोग से मांगा जवाब

न्यूज़रूम डेस्क • • 6 मिनट पढ़ें
SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CEC ज्ञानेश कुमार को तत्काल हटाने से इनकार, आयोग से मांगा जवाब

14 फैसलों में कथित एकतरफा निर्णय का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, कोर्ट बोला- कानून का उल्लंघन मिला तो फैसलों को पलटा जा सकता है

अनप्लग इंडिया। डेस्क

नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को तत्काल निलंबित करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। हालांकि अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से आरोप लगाया गया कि SIR से जुड़े करीब 14 महत्वपूर्ण निर्णय ऐसे तरीके से लिए गए, जिनमें दो अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति या आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सभी फैसले एकतरफा लिए गए थे। इसके लिए चुनाव आयोग से रिकॉर्ड और स्पष्ट जवाब जरूरी है। कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि दस्तावेजों की जांच में कानून या निर्धारित प्रक्रिया के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो संबंधित निर्णयों पर रोक लगाई जा सकती है या उन्हें कानून के अधिकार क्षेत्र से बाहर माना जा सकता है।

CEC को निलंबित करने की मांग पर कोर्ट ने क्या कहा?

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत से मांग की कि मामले की गंभीरता को देखते हुए ज्ञानेश कुमार को CEC के पद से अंतरिम तौर पर हटाया जाए। उनका तर्क था कि यदि चुनाव आयोग के भीतर ही निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं तो निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक व्यवस्था पर इसका असर पड़ सकता है।

वकील ने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर बाकी दो चुनाव आयुक्त चुनाव संबंधी जिम्मेदारियां संभाल सकते हैं।

इस पर पीठ ने व्यावहारिक सवाल उठाया कि यदि CEC को तत्काल हटा दिया जाता है तो चुनाव आयोग की संस्थागत कार्यप्रणाली कैसे चलेगी। अदालत ने तत्काल निलंबन के बजाय पहले संबंधित पक्षों का पक्ष सुनने का रास्ता चुना।

अदालत ने आयोग को दी प्रक्रिया का पालन करने की याद

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि कानून में चुनाव आयोग के निर्णय लेने की व्यवस्था तय है और आयोग से अपेक्षा की जाती है कि वह उसका पालन करे। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि अगर रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि किसी निर्णय में कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो न्यायालय उसके खिलाफ उचित आदेश दे सकता है।

जस्टिस बागची ने इस बात पर जोर दिया कि अदालत बिना रिकॉर्ड देखे यह कैसे मान ले कि सभी विवादित फैसले अकेले CEC ने लिए थे। इसलिए आयोग से स्पष्ट और पारदर्शी जवाब मांगा गया है।

विवाद की जड़ में SIR से जुड़े फैसले

पूरे मामले का केंद्र चुनावी मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण है। याचिकाओं में दावा किया गया है कि SIR से जुड़े कई फैसलों को लेकर चुनाव आयोग के भीतर मतभेद थे और दो चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग मौकों पर आपत्तियां दर्ज की थीं।

रिपोर्टों के मुताबिक, विवादित निर्णयों को लेकर अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच आपत्तियां दर्ज किए जाने का दावा किया गया है। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि होना अभी बाकी है और सुप्रीम कोर्ट ने भी मामले में कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।

याचिका में रिकॉर्ड की जांच की मांग

याचिकाकर्ताओं ने चुनाव आयोग के मूल रिकॉर्ड अदालत के सामने मंगाने की मांग की है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि विवादित फैसले किस प्रक्रिया के तहत लिए गए थे।

एक अन्य याचिका में मामले की स्वतंत्र जांच की मांग भी रखी गई है। इसमें चुनाव आयोग के संबंधित डिजिटल सिस्टम और मतदाता सूची से जुड़े रिकॉर्ड की जांच की बात कही गई है। हालांकि ये सभी आरोप और मांगें अभी न्यायिक जांच के अधीन हैं।

2023 के कानून को लेकर भी उठे सवाल

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों से संबंधित 2023 के कानून का भी उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ता पक्ष ने खास तौर पर CEC को दी गई कानूनी सुरक्षा और आयोग के निर्णय लेने की व्यवस्था पर सवाल उठाए।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि CEC को मिली सुरक्षा के कारण उनके खिलाफ कार्रवाई का रास्ता दूसरे संवैधानिक पदों की तुलना में अलग हो जाता है। हालांकि इस पर भी अंतिम कानूनी निष्कर्ष अभी अदालत को देना है।

क्या सुप्रीम कोर्ट CEC के फैसले रद्द कर सकता है?

इस सुनवाई में अहम सवाल यह भी रहा कि यदि जांच में यह साबित होता है कि चुनाव आयोग के किसी निर्णय में कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो उसके बाद अदालत क्या कर सकती है।

पीठ की टिप्पणियों से संकेत मिला कि यदि रिकॉर्ड से किसी निर्णय में कानूनी कमी या अधिकार से बाहर जाकर कार्रवाई सामने आती है, तो अदालत उस निर्णय पर रोक लगाने या उसे अमान्य घोषित करने पर विचार कर सकती है। फिलहाल कोर्ट ने ऐसा कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है।

मामला अब किस दिशा में जाएगा?

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों समेत संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। अब उनके जवाब मिलने के बाद अदालत यह देखेगी कि लगाए गए आरोप रिकॉर्ड और कानून के अनुरूप हैं या नहीं।

इसलिए फिलहाल CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने या SIR से जुड़े सभी फैसलों को रद्द करने का कोई आदेश नहीं हुआ है। अदालत ने केवल मामले में जवाब मांगा है और आगे की सुनवाई में रिकॉर्ड के आधार पर मुद्दों की जांच की जाएगी।

राजनीतिक विवाद भी तेज

सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने के साथ ही CEC की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। विपक्षी दल चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता सूची में बदलावों को लेकर सवाल उठा रहे हैं, जबकि चुनाव आयोग और भाजपा की ओर से आरोपों को खारिज किया गया है। इस बीच दिल्ली और मुंबई सहित कुछ स्थानों पर CEC के खिलाफ प्रदर्शन भी हुए हैं।

फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने CEC को निलंबित नहीं किया है, लेकिन SIR से जुड़े निर्णयों की प्रक्रिया पर उठे सवालों को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। अब अगली सुनवाई में आयोग का जवाब और मूल रिकॉर्ड इस मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।

 

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