तीन दिन में तीन फतवों से चर्चा में आए बरेली के मौलाना, उमर-निधि की शादी से लेकर सारा की पूजा तक पर उठाए सवाल
केदारनाथ में पूजा करने पर सारा अली खान को तौबा की सलाह, उमर अब्दुल्ला और निधि राजदान के विवाह पर शरीयत का हवाला; ‘मोहम्मद दीपक’ नाम पर भी जताई आपत्ति
अनप्लग इंडिया। डेस्क
बरेली। उत्तर प्रदेश के बरेली के मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी पिछले कुछ दिनों से अपने बयानों और फतवों को लेकर चर्चा में हैं। तीन दिनों के भीतर उन्होंने तीन अलग-अलग मामलों पर धार्मिक राय जारी की है। इनमें जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और वरिष्ठ पत्रकार निधि राजदान की शादी, अभिनेत्री सारा अली खान की केदारनाथ मंदिर में पूजा और उत्तराखंड के कोटद्वार निवासी दीपक कुमार के नाम के साथ ‘मोहम्मद’ जोड़ने का मामला शामिल है।
इन बयानों में मौलाना ने इस्लामी शरीयत का हवाला देते हुए तीनों मामलों पर आपत्ति जताई है। सारा अली खान के मंदिर में पूजा करने को उन्होंने शरीयत के खिलाफ बताया और तौबा करने की सलाह दी। वहीं, उमर अब्दुल्ला और निधि राजदान की शादी को लेकर उन्होंने निकाह से जुड़ी धार्मिक शर्तों का उल्लेख किया। दीपक कुमार के नाम के आगे ‘मोहम्मद’ लगाए जाने पर भी उन्होंने एतराज जताया है। इन टिप्पणियों के बाद धार्मिक मान्यताओं, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सार्वजनिक जीवन में धार्मिक हस्तक्षेप को लेकर बहस तेज हो गई है।
उमर अब्दुल्ला और निधि राजदान की शादी पर उठाया सवाल
पहला मामला जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पत्रकार निधि राजदान की शादी से जुड़ा है। दोनों ने 31 अक्टूबर को सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा कर अपने विवाह की जानकारी दी थी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों ने 30 अक्टूबर को विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act) के तहत शादी की।
इस विवाह पर प्रतिक्रिया देते हुए मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने इस्लामी निकाह की धार्मिक शर्तों का हवाला दिया। उनका कहना है कि इस्लाम में निकाह के लिए दोनों पक्षों का मुस्लिम होना जरूरी है। उनके मुताबिक, यदि निधि राजदान ने इस्लाम स्वीकार नहीं किया है तो इस्लामी शरीयत के अनुसार यह निकाह जायज नहीं माना जाएगा।
हालांकि, यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि मीडिया रिपोर्टों में दोनों की शादी विशेष विवाह अधिनियम के तहत होने की बात कही गई है। मौलाना की टिप्पणी धार्मिक मान्यता के संदर्भ में है, जबकि विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह एक अलग कानूनी प्रक्रिया है।
केदारनाथ में पूजा करने पर सारा अली खान को तौबा की सलाह
दूसरा मामला अभिनेत्री सारा अली खान के केदारनाथ मंदिर जाने और वहां पूजा-अर्चना करने से जुड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक, सारा 25 अक्टूबर को केदारनाथ पहुंची थीं। उनकी मंदिर में दर्शन और पूजा करते हुए तस्वीरें सामने आई थीं।
सारा की इस यात्रा पर मौलाना ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि इस्लाम में किसी दूसरे धर्म की धार्मिक परंपराओं के तहत पूजा-पाठ करने की अनुमति नहीं है। उनके अनुसार, यदि सारा ने अपनी इच्छा से मंदिर में पूजा और धार्मिक अनुष्ठान किए हैं तो यह शरीयत की दृष्टि से नाजायज है। मौलाना ने अभिनेत्री को अल्लाह से माफी मांगने और तौबा करने की सलाह भी दी।
सारा अली खान पहले भी केदारनाथ मंदिर की यात्राओं को लेकर चर्चा में रही हैं। केदारनाथ से उनका जुड़ाव उनकी पहली फिल्म ‘केदारनाथ’ के समय से भी रहा है। अभिनेत्री की ओर से इस ताजा टिप्पणी पर कोई प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है।
‘मोहम्मद दीपक’ नाम रखने पर भी जताई आपत्ति
तीसरा मामला उत्तराखंड के कोटद्वार के रहने वाले दीपक कुमार से जुड़ा है। दीपक उस समय चर्चा में आए थे, जब एक स्थानीय विवाद के दौरान उन्होंने अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ बताया था। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। इसके बाद से उन्हें इसी नाम से पहचाना जाने लगा।
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने दीपक के नाम के आगे ‘मोहम्मद’ जोड़ने पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि मोहम्मद पैगंबर-ए-इस्लाम का पवित्र नाम है और इसे किसी गैर-मुस्लिम व्यक्ति द्वारा अपने नाम के आगे लगाना उचित नहीं है। उनके मुताबिक, इस्लाम स्वीकार करने के बाद ही कोई व्यक्ति इस नाम को अपना सकता है।
यह मामला केवल नाम तक सीमित नहीं है। कोटद्वार में दीपक कुमार की पहचान उस समय बनी थी, जब उन्होंने एक मुस्लिम दुकानदार के समर्थन में हस्तक्षेप किया था। इसी घटना के दौरान उन्होंने अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ बताया था। इस घटना ने उन्हें सोशल मीडिया पर व्यापक पहचान दिलाई।
फतवों के बाद निजी आस्था और धार्मिक स्वतंत्रता पर बहस
तीनों मामलों में एक समान बात यह है कि इनका संबंध व्यक्तियों के निजी जीवन, धार्मिक आस्था या पहचान से है। उमर अब्दुल्ला और निधि राजदान का विवाह, सारा अली खान की मंदिर यात्रा और दीपक कुमार द्वारा अपने नाम के साथ ‘मोहम्मद’ जोड़ना अलग-अलग परिस्थितियों से जुड़े मामले हैं।
सारा अली खान के मामले में उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने भी मौलाना के बयान की आलोचना की। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की धार्मिक पसंद को लेकर विवाद खड़ा करना उचित नहीं है और धार्मिक नेताओं को समाज की वास्तविक समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि फतवा किसी अदालत का आदेश या सरकारी कानूनी फैसला नहीं होता। यह धार्मिक कानून से जुड़े सवाल पर किसी इस्लामी विद्वान की राय या धार्मिक व्याख्या होती है। इसलिए किसी फतवे को कानूनी प्रतिबंध या न्यायिक आदेश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
फिलहाल इन तीनों मामलों को लेकर सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चा में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक पक्ष इसे धार्मिक मान्यताओं के आधार पर दी गई राय बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे लोगों की निजी आस्था, पहचान और व्यक्तिगत फैसलों में दखल के रूप में देख रहा है।
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