पूर्व हरियाणा DGP से जमीन सौदे में धोखाधड़ी का आरोप साबित नहीं, कोर्ट ने दोनों आरोपियों को किया बरी
सात साल पुराने मामले में अभियोजन पक्ष नहीं दे सका पर्याप्त सबूत; गन्नौर कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए सुनाया फैसला, शिकायतकर्ता और उनकी पत्नी का हो चुका है निधन
अनप्लग इंडिया। डेस्क
सोनीपत। हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) और सेवानिवृत्त IPS अधिकारी लायक राम डबास से जुड़े जमीन सौदे में धोखाधड़ी के मामले में अदालत ने दोनों आरोपियों को बरी कर दिया है। सोनीपत जिले की गन्नौर अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया।
मामले में पानीपत जिले के नगला बाग निवासी सुल्तान सिंह और दिल्ली के बवाना निवासी नारायण सिंह आरोपी थे। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 13 गवाह पेश किए, लेकिन अदालत के सामने ऐसा पर्याप्त साक्ष्य नहीं आया, जिससे यह साबित हो सके कि जमीन बेचते समय आरोपियों की मंशा धोखाधड़ी करने की थी।
यह फैसला मामले की शुरुआत के करीब सात साल बाद आया है। इस बीच शिकायतकर्ता लायक राम डबास और उनकी पत्नी गीता डबास, दोनों का निधन हो चुका है। लायक राम डबास की अदालत में मुख्य गवाही भी दर्ज नहीं हो सकी थी।
सितंबर 2018 में खरीदी थी जमीन, बाद में सामने आया कोर्ट का आदेश
शिकायत के अनुसार, सोनीपत के सेक्टर-19 निवासी लायक राम डबास और उनकी पत्नी गीता डबास ने 14 सितंबर 2018 को गांव बड़ी, तहसील गन्नौर में जमीन खरीदी थी। इसके लिए रजिस्टर्ड सेल डीड संख्या 2190 के माध्यम से सौदा किया गया था।
लायक राम डबास ने 16 अक्टूबर 2018 को गन्नौर थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी। उनका आरोप था कि जमीन से संबंधित एक मामला दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित था और 2 फरवरी 2018 को संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक लगाने का आदेश दिया गया था।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि जमीन बेचने वाले पक्ष ने इस मुकदमे और अदालत के आदेश की जानकारी छिपाई। इसी आधार पर उन्होंने धोखाधड़ी का आरोप लगाया। पुलिस ने जांच के बाद मामले में आरोपपत्र अदालत में दाखिल किया था।
13 गवाहों के बयान हुए, लेकिन आरोप साबित नहीं हुए
मामले की सुनवाई न्यायिक मजिस्ट्रेट सागर शर्मा की अदालत में हुई। अभियोजन पक्ष की ओर से सहायक सरकारी वकील ने कुल 13 गवाह पेश किए और दलील दी कि जमीन के सौदे में अदालत के आदेश की जानकारी छिपाई गई थी।
वहीं, आरोपियों की ओर से उनके अधिवक्ताओं ने आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि उन्हें मामले में झूठा फंसाया गया है।
सुनवाई के दौरान रजिस्ट्री कार्यालय के क्लर्क और संबंधित हलका पटवारी की गवाही महत्वपूर्ण रही। दोनों ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि सरकारी राजस्व रिकॉर्ड और सेल डीड में अदालत की रोक दर्ज नहीं थी।
अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों पर विचार करने के बाद पाया कि आरोपियों के खिलाफ आपराधिक धोखाधड़ी का आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं।
कोर्ट ने कहा—धोखाधड़ी की मंशा साबित करना जरूरी
अदालत ने अपने 21 पन्नों के फैसले में कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी का अपराध साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति की शुरुआत से ही बेईमानी या धोखा देने की मंशा थी।
इस मामले में ऐसा पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपियों ने जमीन का सौदा करते समय जानबूझकर कोई झूठा आश्वासन दिया या धोखाधड़ी की योजना बनाई थी।
अदालत ने यह भी माना कि केवल शिकायत या एफआईआर दर्ज होने से आरोप साबित नहीं हो जाते। आपराधिक मामले में अभियोजन पक्ष को साक्ष्यों के आधार पर आरोपों को संदेह से परे साबित करना होता है।
शिकायतकर्ता की गवाही नहीं हो सकी दर्ज
इस मामले का एक अहम पहलू यह भी रहा कि शिकायतकर्ता लायक राम डबास का जुलाई 2022 में निधन हो गया था। इसके कारण उनकी मुख्य गवाही अदालत में दर्ज नहीं हो सकी।
अदालत के सामने शिकायत और एफआईआर के अलावा उपलब्ध अन्य साक्ष्यों का परीक्षण किया गया। सुनवाई के दौरान ऐसा स्वतंत्र और पर्याप्त प्रमाण सामने नहीं आया, जिससे आरोपियों की कथित आपराधिक मंशा स्थापित हो सके।
अदालत ने इस तथ्य को भी मामले के समग्र साक्ष्यों के साथ देखा और आरोपियों को संदेह का लाभ देने का आधार माना।
जमीन के राजस्व रिकॉर्ड को भी माना महत्वपूर्ण
अदालत के फैसले में जमीन से जुड़े पुराने न्यायिक आदेश और राजस्व रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जिस सेल डीड के तहत जमीन से संबंधित अधिकार दर्ज हुए थे, उसे 29 नवंबर 2017 के अदालत के फैसले के बाद बहाल किया गया था। पटवारी के रिकॉर्ड में नामांतरण दर्ज होने की बात भी सामने आई।
रजिस्ट्री क्लर्क और पटवारी के बयानों के अनुसार, संबंधित सरकारी रिकॉर्ड में संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक दर्ज नहीं थी। अदालत ने इन तथ्यों को भी साक्ष्यों के मूल्यांकन में ध्यान में रखा।
आपराधिक साजिश का स्वतंत्र प्रमाण नहीं मिला
अदालत ने यह भी पाया कि दोनों आरोपियों के बीच धोखाधड़ी की साजिश रचे जाने का कोई स्वतंत्र और पर्याप्त सबूत सामने नहीं आया। अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को आवश्यक कानूनी मानक तक साबित नहीं कर सका।
इन्हीं तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट सागर शर्मा की अदालत ने सुल्तान सिंह और नारायण सिंह को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
फैसले का सार: अदालत ने आरोपियों को इसलिए बरी किया क्योंकि अभियोजन पक्ष धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के आरोपों को पर्याप्त साक्ष्यों से साबित नहीं कर पाया। यह फैसला उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दिया गया है।
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