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12 अक्तूबर 2026 | भरोसेमंद खबरें, सीधे आपके शहर से
अंक: 12 Oct 2026
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एसआईआर लोकतंत्र की चिंता और विश्वास की कसौटी

न्यूज़रूम डेस्क • • 3 मिनट पढ़ें
एसआईआर लोकतंत्र की चिंता और विश्वास की कसौटी

संपादकीय

मतदाता सूची में सुधार जरूरी है, लेकिन इसके साथ यह सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि पात्र नागरिकों का नाम न छूटे और चुनावी प्रक्रिया में लोगों का विश्वास बना रहे।

यह भी समझना होगा कि मतदाता सूची में सुधार कोई एक बार होने वाला अभियान नहीं हो सकता। शहरों में तेजी से बढ़ता प्रवास, गांवों से शहरों की ओर पलायन, विवाह के बाद निवास परिवर्तन, युवाओं का 18 वर्ष की आयु पूरी करना, मृत्यु और एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण लगातार होते रहते हैं।

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसका मतदाता है और मतदाता की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पहचान उसका मताधिकार है। इसलिए मतदाता सूची केवल नामों का प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है।

जिस व्यक्ति का नाम पात्र होते हुए मतदाता सूची में नहीं है, उसकी लोकतांत्रिक भागीदारी अधूरी रह जाती है। वहीं जिस व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी हो, जो स्थानांतरित हो गया हो अथवा जिसका नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज हो, उसका नाम सूची में बने रहना चुनाव की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े करता है।

इसी दृष्टि से मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया है। लेकिन इसकी सफलता केवल गलत या अपात्र नाम हटाने से नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम सुरक्षित रखने और छूटे हुए मतदाताओं को वापस जोड़ने से तय होगी।

निर्वाचन आयोग ने 2026 में एसआईआर की प्रक्रिया को कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक विस्तारित किया है। आयोग के कार्यक्रम में घर-घर जाकर सत्यापन, प्रारूप मतदाता सूची का प्रकाशन, दावे और आपत्तियां लेने तथा अंतिम सूची प्रकाशित करने जैसी प्रक्रियाएं निर्धारित की गई हैं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि 27 मई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार में किए गए एसआईआर की वैधानिकता को बरकरार रखा और माना कि निर्वाचन आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के संबंधित प्रावधानों के तहत ऐसी प्रक्रिया संचालित करने का अधिकार है।

न्यायालय ने यह भी माना कि प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की रक्षा से जुड़ा वैध उद्देश्य है।

एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर स्वाभाविक रूप से राजनीतिक और सामाजिक बहस पैदा हुई है। लेकिन बेवजह चुनाव आयोग एवं मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर विवाद खड़े किए जाने की स्थितियां विडंबनापूर्ण हैं।

लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है हर पात्र नागरिक का मतदान का अधिकार सुरक्षित रहना। इसलिए एसआईआर जैसी प्रक्रिया में पारदर्शिता, स्पष्ट नियम, पर्याप्त समय और दावे-आपत्तियों के प्रभावी निस्तारण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

आखिरकार मतदाता सूची केवल सरकारी रिकॉर्ड नहीं है। यह नागरिक की लोकतांत्रिक पहचान और उसके मताधिकार से सीधे जुड़ी हुई है। इसलिए इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी कसौटी यही होनी चाहिए कि गलत नाम हटें, लेकिन किसी पात्र नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार न छिने।

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