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12 अक्तूबर 2026 | भरोसेमंद खबरें, सीधे आपके शहर से
अंक: 12 Oct 2026
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वोट बैंक से नीति-निर्माता तक!

न्यूज़रूम डेस्क • • 9 मिनट पढ़ें
वोट बैंक से नीति-निर्माता तक!

मुस्लिम राजनीति का कल, आज और कल

प्रमोद पंत
अहिंसा की राजनीति का एक कार्यकर्ता

एक मुस्लिम बस्ती की रात से उठे से सवाल, जिनका जवाब सिर्फ चुनाव नहीं, संविधान, शिक्षा, रोजगार, प्रतिनिधित्व और नागरिक भागीदारी में तलाशना होगा।

एक रात मैं अपने एक मुस्लिम मित्र की बस्ती में रूका। रात गहराती गई, लेकिन बातचीत खत्म नहीं हुई। एक के बाद एक सवाल सामने आते रहे। हमारे साथ एक नागरिक की तरह व्यवहार क्यों नहीं किया जाता? क्या हमारी राजनीति सिर्फ चुनाव के समय याद किए जाने तक सीमित है?

फिर खाने को लेकर सवाल आया-

“हम झटके की जगह हलाल खाना पसंद करते हैं, तो क्या यह सिर्फ धार्मिक पहचान है?”

और फिर मदरसे पर सवाल उठा-

“क्या मदरसे में सिर्फ धार्मिक शिक्षा होती है? क्या वहां गणित, विज्ञान, भाषा और आधुनिक शिक्षा की पर्याप्त जगह नहीं होनी चाहिए?”

सवाल बहुत थे। इन सवालों में नाराजगी भी थी, डर भी, पहचान भी और भविष्य की तलाश भी।

लेकिन इन सबसे बड़ा सवाल था-

क्या अल्पसंख्यक नागरिकों की राजनीति सिर्फ सुरक्षा और वोट तक सीमित रहेगी, यह वह शिक्षा, रोजगार, बजट, प्रतिनिधत्व और नीति-निर्माता की राजनीति बनेगी?

यही सवाल आज सिर्फ मुस्लिम समाज का नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के सामने भी है।

प्रजा नहीं- संविधान के बराबर नागरिक

भारत का संविधान नागरिक को किसी शासक की प्रजा नहीं मानता।

अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता का आधार देता है।अनुच्छेद 15 धर्म आदि के आधार पर भेदभाव से सुरक्षा देता है। अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा है। अनुच्छेद 29 सांस्कृतिक और भाषाई पहचान के संरक्षण का अधिकार देता है और अनुच्छेद 30 धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित और संचालित करने का अधिकार देता है।

इसकाअर्थसाफहै-

अल्पसंख्यक होना किसी नागरिक को कमतर नागरिक नहीं बनाता।

लेकिन नागरिकता सिर्फ अधिकार पाने का नाम भी नहीं है।

नागरिकता का मतलब है- अधिकार जानना, कर्तव्य समझना, संस्थाओं से सवाल पूछना, बजट समझना, नीति पर चर्चा करना, और लोकतांत्रिक निर्णयों में भाग लेना।

यहीं से “प्रजा” से “नागरिक” बनने की यात्रा शुरू होती है।

सुरक्षा जरूरी है, लेकिन राजनीति सिर्फ सुरक्षा नहीं

अल्पसंख्यक राजनीति का एक बड़ा सवाल सुरक्षा रहा है। जहां किसी समुदाय में असुरक्षा की भावना पैदा होती है, वहां राजनीति स्वाभाविक रूप से सुरक्षा की ओर जाती है। लेकिन क्या राजनीति की मंजिल केवल सुरक्षा हो सकती है?

नहीं।

सुरक्षा के साथ शिक्षा चाहिए। शिक्षा के साथ रोजगार चाहिए। रोजगार के साथ उद्यमिता चाहिए। उद्यमिता के साथ वित्तीय अवसर चाहिए।

इन सबके साथ राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिनिधित्व चाहिए।

और प्रतिनिधित्व का अर्थ केवल विधानसभा या संसद में टिकट मिलना नहीं है।

पंचायत से संसद तक- नीति बनाने की प्रक्रिया में भागीदारी ही वास्तविक राजनीतिक नागरिकता है।

वोट बैंक से नीति-निर्माता तक

लोकतंत्र में वोट महत्वपूर्ण है। लेकिन नागरिक की ताकत सिर्फ वोट डालने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। एक जागरूक नागरिक को सवाल पूछने का हक है। यही सवाल वोट बैंक की राजनीति को नागरिक-नीति की राजनीति में बदल सकते हैं।

“हमारे साथ अलग व्यवहार क्यों?”

यह सवाल भावनात्मक है, लेकिन इसका जवाब भावनाओं से नहीं- तथ्यों और कानून से तलाशना चाहिए। अगर किसी नागरिक के साथ भेदभाव हुआ है तो सवाल होना चाहिए- कहां हुआ? किस संस्था में हुआ? किस नियम का उल्लंघन हुआ? शिकायत किस अधिकारी के पास जाएगी? उसका समाधान कैसे होगा?

यानी शिकायत को केवल राजनीतिक भाषण न बनाया जाए। उसे दस्तावेज, शिकायत, कानूनी अधिकार और संस्थागत जवाबदेही में बदला जाए। यह नागरिक राजनीति है।

हलाल बनाम झटका

बस्ती में उठे सवालों में भोजन भी था। हलाल या झटका-यह कई लोगों के लिए धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत पसंद का विषय है। लेकिन यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा। बहस को धार्मि पहचान बनाम दूसरी पहचान की लड़ाई बनाने के बजाय पूछा जा सकता है-

क्या उपभोक्ता को अपने भोजन के बारे में सही जानकारी मिल रही है? क्या लेबलिंग पारदर्शी है? क्या खाद्य-सुरक्षा मानक सभी पर समान रूप से लागू होते हैं?

यही सवाल पहचान की राजनीति को उपभोक्ता अधिकार की राजनीति से जोड् सकते हैं।

क्या मदरसा सिर्फ राजनीति है?

यह भी बस्ती में उठे महत्वपूर्ण सवालों में से एक था। इसका जवाब एक शब्द में नहीं दिया जा सकता। भारत में मदरसों की प्रकृति एक जैसी नहीं है। विभिन्न मदरसों में पाठ्यक्रम और विषयों में एकरूपता नहीं है। कुछ में धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक विषय भी पढ़ाए जाते हैं। समय-समय में मदरसा शिक्षा में विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान, हिंदी और अंग्रेजी जैसे विषयों को शामिल करने के लिए भी योजनाएं चलाई जाती हैं।

इसलिए सही सवाल यह नहीं है—

“मदरसा अच्छा है या खराब?”

सवाल होना चाहिए-

“हर बच्च् को ऐसी शिक्षा कैसे मिले जिससे वह अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के साथ आधुनिक ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, भाषा और रोजगार की दुनिया में भी बराबरी से आगे बढ़ सके?”

यही बहस भविष्य की दिशा तय कर सकत है।

नेतृत्व सिर्फ बड़े नेताओं से नहीं बनता

किसी समुदाय की राजनीतिक ताकत केवल उसके बड़े नेताओं की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। असल नेतृत्व तो तब बनता है जब—

·         गांव में शिक्षित युवा पंचायत की बैठक मे सवाल पूछता है।

·         महिला स्वयं सहायता समूह के माध्यम से आर्थिक निर्णय लेती है।

·         छात्र संविधान और अपने अधिकार समझता है।

·         व्यापारी उपभोक्ता और कर नियमों को समझता है।

·         युवा डिजिटल दुनिया में गलत सूचना को पहचानता है।

·         स्थानीय नागरिक नगर निकाय के बजट पर सवाल करता है।

और समाज अपने नेताओं से पूछता है..

“आप हमारे लिए क्या मांग रहे हैं?”और“आप हमें किसके खिलाफ खड़ा कर रहे हैं?”

हिंदू-मुस्लिम एकता: नारा नहीं, नागरिक साझेदारी

भारत की विविधता को राजनीति का संघर्ष बनाने के बजाय लोकतांत्रिक साझेदारी में बदला जा सकता है।

अलग आस्था- समान नागरिकता।

अलग संस्कृति-समान सम्मान।

अलग विचार- समान लोकतांत्रिक अधिकार।

हिंदू-मुस्लिम एकता का अर्थ यह नहीं कि दोनों समुदाय अपनी पहचान छोड़ दें। इसका अर्थ है-

पहचान अपनी- संविधान साझा।

आस्था अपनी- नागरिक अधिकार साझा।

राजनीतिक विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक अधिकार समान रहें।

आखिरी हम बनना क्या चाहते हैं?

उस रात बस्ती में बातचीत खत्म होने के बाद एक सवाल बार-बार मेरे मन को बैचेन कर रह है। किसी भी समुदाय को हमेशा डर में जीने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। उस डर से बाहर निकलने का रास्ता केवल राजनीतिक भाषण नहीं है। उसका रास्ता है– संविधान को समझना। अपने अधिकारों को जानना। शिक्षा को मजबूत करना। रोजगार पैदा करना। महिलाओं और युवाओं को नेतृत्व देना। पंचायत से नीति-निर्मा तक पहुंच बनाना।

अल्पसंख्यक राजनीति की नई राह किसी एक दल के साथ खड़े होने की राह नहीं है। यह नागरिक के रूप में खड़े होने की राह है। वोट दीजिए- लेकिन सवाल भी पूछिए। अपनी पहचान पर गर्व कीजिए- लेकिन दूसरे की पहचान का सम्मान भी कीजिए। अपने अधिकार मांगिए- लेकिन अपने कर्तव्य भी निभाइए। और सबसे महत्वपूर्ण-

खुद को किसी की “प्रजा” नहीं, भारत के संविधान से अधिकार प्राप्त बराबर का नागरिक समझिए।

क्योंकि यही डर से अधिकार तक की यात्रा है। यही प्रजा से नागरिक तक का सफर है। अब राजनीति को इस फॉर्मूले से पढ़ने की जरूरत है……

पहचान + संविधान।

सुरक्षा + अवसर

शिक्षा + रोजगार

प्रतिनिधित्व + नेतृत्व

वोट + जवाबदेही

अधिकार + कर्तव्य

स्थानीय भागीदारी + राष्ट्रीय नीति

यही राजनीति को केवल चुनावी गणित से निकालकर नागरिक शक्ति में बदल सकती है।

भारतीय मुसलमानों का देश की आजादी में योगदान

हिंदू-मुस्लिम एकता केवल भाषण का विषय नहीं था, वह देश की आजादी की वास्तविक राजनीतिक शक्ति भी रह है। हमें यह भी याद रखना जरूरी है कि भारतीय मुसलमानों का इतिहास केवल विभाजन या मुस्लिम लीग के इतिहास तक सीमित नहीं है। मौलाना अबुल कलाम आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खान, अशफाकउल्ला खान, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी, हकीम अजमल खान, डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी, बदरूद्दीन तैयबजी, रफी अहमद किदवई और अनेक अन्य व्यक्तियों का योगदान अलग-अगल धाराओं में रहा है। भारत सरकार के अभिलेख भी देश की आजादी के संघर्ष में अनेक मुस्लिम नेताओं के योगदान और हिंदू-मुस्लिम साझी भागीदारी को दर्ज करते हैं। इस इतिहास का संदेश स्पष्ट है- भारतीय मुसलमान भारत के इतिहास के दर्शक नहीं थे,वे उसके निर्माता भी रहे हैं।

मौलाना आजाद: धर्म की पहचान और भारतीय राष्ट्रवाद साथ-साथ

मौलाना अबुल कलाम आजाद एक इस्लामी विद्वान, उर्दू पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी और स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा बने। वह हिंदू-मुस्लिम एकता और अविभाजित भारत के प्रमुख समर्थकों में एक थे।

खान अब्दुल गफफार खान: अहिंसा की सबसे बड़ी मिसालों में एक

खान अब्दुल गफ्फार खान ने पश्तून समाज में खुदाई खिदमतगार आंदोलन के माध्यम से अहिंसक संघर्ष का रास्ता अपनाया। उनका जीवन गांधी के अहिंसक आंदोलन के साथ मुस्लिम समाज की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ी है।

अशफाकउल्ला खान: देश के लिए बलिदान

उनका जीवन यह दिखाता है कि स्वतंत्रता आंदोलन में मुस्लिम युवाओं की भागीदारी केवल एक राजनीतिक धारा तक सीमित नहीं थी। रास्ते अलग थे, लेकिन औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता की आकांक्षा साझा थी।

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