आखिर कब प्रदूषण मुक्त होगी देश की राजधानी?
जहांगीरपुरी में यह 440, पंजाबी बाग में 436 और रोहिणी में 425 दर्ज किया गया। कुछ अन्य क्षेत्रों में भी स्थिति बेहद चिंताजनक रही। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, 3 नवंबर को दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक 350 तक पहुंच गया था। यह इस वर्ष फरवरी के बाद सबसे खराब स्थिति बताई गई
महेन्द्र तिवारी
साहित्यकार एवं लेखक
पूर्व वायुसैनिक | नई दिल्ली
दिल्ली में दिवाली की आहट के साथ ही एक बार फिर प्रदूषण का संकट गहराने लगा है। त्योहार की तैयारियों के बीच राजधानी की हवा इतनी जहरीली होती जा रही है कि लोगों के लिए खुले में सांस लेना भी कठिन हो गया है। सुबह की सैर करने वाले लोग घरों में रहने को मजबूर हैं। सड़कों, इमारतों और पेड़ों पर धुंध की मोटी परत दिखाई देने लगी है। आंखों में जलन, गले में खराश, खांसी और सांस लेने में परेशानी जैसी शिकायतें बढ़ रही हैं। यह स्थिति केवल पर्यावरण से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य और जीवन की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।
भारतीय मौसम विज्ञान संस्थान की वायु गुणवत्ता संबंधी निगरानी के अनुसार, दिल्ली के कई इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक 400 के पार पहुंच गया। जहांगीरपुरी में यह 440, पंजाबी बाग में 436 और रोहिणी में 425 दर्ज किया गया। कुछ अन्य क्षेत्रों में भी स्थिति बेहद चिंताजनक रही। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, 3 नवंबर को दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक 350 तक पहुंच गया था। यह इस वर्ष फरवरी के बाद सबसे खराब स्थिति बताई गई। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि राजधानी की हवा अब सामान्य जनजीवन के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है।
प्रदूषण की गंभीरता को देखते हुए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने 2 नवंबर को दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में क्रमिक प्रतिक्रिया कार्ययोजना के दूसरे चरण को लागू कर दिया। इसके अंतर्गत सड़कों की नियमित यांत्रिक सफाई, धूल दबाने के लिए पानी का छिड़काव, निर्माण स्थलों पर कड़ी निगरानी और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर नियंत्रण जैसे उपाय किए जा रहे हैं। सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के लिए अतिरिक्त रेलगाड़ियां चलाने और यातायात के दबाव वाले स्थानों पर निगरानी बढ़ाने जैसे कदम भी उठाए गए हैं। हालांकि सवाल यह है कि क्या ये उपाय राजधानी को प्रदूषण से वास्तविक राहत दिला पाएंगे या फिर हर वर्ष की तरह कुछ दिनों की सख्ती के बाद स्थिति पहले जैसी हो जाएगी?
दिल्ली के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण किसी एक गतिविधि को नहीं माना जा सकता। इसके पीछे कई कारक एक साथ काम करते हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक इकाइयों का उत्सर्जन, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, सड़कों पर जमा मिट्टी, कूड़ा जलाना और आसपास के राज्यों में पराली जलाने की घटनाएं वायु को प्रदूषित करती हैं। इसके अतिरिक्त मौसम में बदलाव भी इस समस्या को गंभीर बना देता है। तापमान में गिरावट, हवा की कम गति और वातावरण में नमी के कारण प्रदूषक कण ऊपर नहीं उठ पाते। वे धरती के निकट ही जमा होते रहते हैं। परिणामस्वरूप धुंध की मोटी परत बन जाती है और सांस के साथ सूक्ष्म प्रदूषक कण शरीर के भीतर पहुंचने लगते हैं।
हर वर्ष धान की कटाई के बाद पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में फसल अवशेष जलाने की घटनाएं सामने आती हैं। इस वर्ष भी इन घटनाओं में वृद्धि की खबरें हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उपग्रह आंकड़ों के अनुसार, 3 नवंबर को छह राज्यों में फसल अवशेष जलाने की 798 घटनाएं दर्ज की गईं। हालांकि दिल्ली के प्रदूषण के लिए केवल पराली को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। राजधानी के भीतर मौजूद प्रदूषण के स्रोत भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। जब स्थानीय प्रदूषण और प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियां एक साथ मिलती हैं, तब समस्या और विकराल हो जाती है। इसलिए राज्यों के बीच आरोप-प्रत्यारोप के बजाय साझा समाधान की आवश्यकता है।
दिवाली के अवसर पर पटाखों का उपयोग इस समस्या को और बढ़ा सकता है। आतिशबाजी से निकलने वाला धुआं और सूक्ष्म कण पहले से प्रदूषित वातावरण में अतिरिक्त विषाक्तता पैदा करते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस वर्ष दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रमाणित हरित पटाखों के सीमित उपयोग की अनुमति दी है। न्यायालय के निर्देश के अनुसार, 7 और 8 नवंबर को सुबह 6 से 7 बजे तथा रात 8 से 10 बजे तक ही इन्हें जलाया जा सकेगा। इनकी बिक्री 4 से 6 नवंबर तक निर्धारित अधिकृत स्थानों पर होगी। अस्पतालों, स्वास्थ्य केंद्रों, वृद्धाश्रमों, शिक्षण संस्थानों और घोषित शांत क्षेत्रों के 300 मीटर के दायरे में पटाखे जलाने पर रोक रहेगी। 9 नवंबर से पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध फिर लागू हो जाएगा।
हरित पटाखों को पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम प्रदूषण फैलाने वाला विकल्प माना जाता है। इनका निर्माण वैज्ञानिक मानकों और निर्धारित प्रमाणन के अनुसार किया जाता है। इनके पैकेट पर पहचान के लिए विशेष संकेत और क्यूआर कोड होना आवश्यक है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि हरित पटाखे प्रदूषण रहित नहीं होते। उनसे भी धुआं, ध्वनि और हानिकारक कण निकलते हैं। यदि बड़ी संख्या में लोग निर्धारित समय से अधिक देर तक आतिशबाजी करते हैं तो प्रदूषण कम करने का उद्देश्य विफल हो सकता है। इसलिए न्यायालय के निर्देशों का पालन केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य भी है।
प्रदूषण का सबसे अधिक प्रभाव बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से सांस तथा हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों पर पड़ता है। छोटे बच्चों के फेफड़े विकास की अवस्था में होते हैं। ऐसे में जहरीली हवा उनके स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है। बुजुर्गों के लिए भी प्रदूषित वातावरण गंभीर खतरा पैदा करता है। स्वस्थ व्यक्ति भी लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से सांस संबंधी परेशानियों का शिकार हो सकता है। इस स्थिति में विद्यालयों, अस्पतालों और सार्वजनिक संस्थानों को विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए। बच्चों को अनावश्यक रूप से खुले मैदानों में खेलने से रोकना, सुबह और शाम की बाहरी गतिविधियों को सीमित करना तथा चिकित्सकीय सलाह का पालन करना आवश्यक है।
प्रदूषण से निपटने के लिए सरकार को तात्कालिक कदमों के साथ दीर्घकालिक योजना भी बनानी होगी। सार्वजनिक परिवहन को अधिक सुविधाजनक और सुलभ बनाना इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि बसों और रेलगाड़ियों की संख्या बढ़ेगी तथा उनकी सेवाएं नियमित होंगी तो निजी वाहनों पर निर्भरता कम हो सकती है। पुराने और अधिक धुआं छोड़ने वाले वाहनों पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है। निर्माण स्थलों पर धूल रोकने के नियमों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। सड़कों की सफाई केवल औपचारिकता नहीं होनी चाहिए, बल्कि वैज्ञानिक तरीके से नियमित रूप से की जानी चाहिए। औद्योगिक इकाइयों के उत्सर्जन की निगरानी भी लगातार होनी चाहिए।
किसानों के सामने फसल अवशेषों के निपटारे की समस्या को समझे बिना पराली जलाने पर रोक लगाना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें ऐसी मशीनों, तकनीकों और आर्थिक सहायता की जरूरत है, जिनसे खेतों में बचे अवशेषों का उपयोग किया जा सके। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर काम करना चाहिए। किसानों को दोषी ठहराने के बजाय उन्हें व्यवहारिक विकल्प उपलब्ध कराने होंगे। फसल अवशेषों से जैविक खाद, ऊर्जा और अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार करने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। इससे पर्यावरण की रक्षा के साथ किसानों की आय बढ़ाने के अवसर भी पैदा होंगे।
नागरिकों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। छोटी-छोटी सावधानियां सामूहिक रूप से बड़ा बदलाव ला सकती हैं। निजी वाहन के स्थान पर सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, छोटी दूरी के लिए पैदल चलना, कूड़ा और पत्तियां नहीं जलाना, निर्माण सामग्री को ढककर रखना और अनावश्यक ऊर्जा खपत से बचना ऐसे कदम हैं जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति अपना सकता है। त्योहार मनाने के लिए पटाखों को अनिवार्य मानने की सोच भी बदलनी होगी। दीपक, रंगोली, सामूहिक सांस्कृतिक आयोजन और परिवार के साथ उत्सव मनाने के अनेक विकल्प मौजूद हैं। त्योहार का वास्तविक आनंद तभी है, जब उसकी खुशियां किसी दूसरे के लिए बीमारी और परेशानी का कारण न बनें।
दिल्ली की प्रदूषित हवा हमें विकास की दिशा और जीवन की गुणवत्ता पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करती है। ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें और चमकते बाजार किसी शहर की सफलता के पर्याप्त प्रमाण नहीं हो सकते। किसी राजधानी की वास्तविक समृद्धि इस बात से भी तय होती है कि वहां रहने वाले नागरिक कितनी स्वच्छ हवा में सांस लेते हैं। हर वर्ष सर्दियों के आरंभ में प्रदूषण का बढ़ना और फिर अस्थायी उपायों से उसे नियंत्रित करने का प्रयास हमारी नीतियों की कमजोरियों को उजागर करता है। अब समय आ गया है कि प्रदूषण को मौसमी संकट मानने के बजाय स्थायी सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय चुनौती के रूप में देखा जाए।
दिवाली प्रकाश, उल्लास और नई आशाओं का त्योहार है। इसकी चमक धुएं और धुंध में खोनी नहीं चाहिए। सरकार, प्रशासन, उद्योग, किसान और आम नागरिक, सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। अदालत के आदेशों का पालन और प्रदूषण नियंत्रण के उपाय तभी सफल होंगे, जब उनके साथ जनभागीदारी भी जुड़ी होगी। हमें ऐसी दिवाली मनाने का संकल्प लेना चाहिए, जिसमें घरों और गलियों में दीप जलें, चेहरों पर मुस्कान हो और हवा में सांस लेने का भरोसा बना रहे। आखिर स्वच्छ हवा किसी एक मौसम या त्योहार की जरूरत नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का बुनियादी अधिकार है।
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