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15 अक्तूबर 2026 | भरोसेमंद खबरें, सीधे आपके शहर से
अंक: 15 Oct 2026
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श्रीदुर्गा-तत्त्व: शिव – शक्ति का सनातन रहस्य

न्यूज़रूम डेस्क • • 9 मिनट पढ़ें
श्रीदुर्गा-तत्त्व: शिव – शक्ति का सनातन रहस्य

 सरस्वती ज्ञान, वाणी और सृजनात्मक प्रतिभा की अधिष्ठात्री हैं; महालक्ष्मी समृद्धि, ऐश्वर्य, संतुलन और पालन की प्रतीक हैं; जबकि महाकाली तथा दुर्गा अन्याय, आसुरी प्रवृत्तियों और अधर्म के विनाश की शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं

कुंवर शील वर्धन प्रताप नारायण सिंह
एडवोकेट/पत्रकार
वरिष्ठ उपाध्यक्ष
गोरखपुर प्रेस क्लब

 भारतीय वाङ्मय में दुर्गा केवल दुष्टों का संहार करने वाली देवी नहीं, अपितु सृष्टि की सृजनात्मक ऊर्जा, पालन-पोषण की मातृशक्ति और धर्म-संरक्षण की सनातन चेतना की प्रतीक हैं। वेदों, उपनिषदों और संस्कृत साहित्य में वर्णित शिव-शक्ति का समन्वय उनके व्यापक स्वरूप को उद्घाटित करता है। भारतीय संस्कृति एवं सनातन धर्म-दर्शन में देवी दुर्गा का स्वरूप अत्यंत व्यापक, बहुआयामी और दार्शनिक महत्त्व से परिपूर्ण है। संस्कृत साहित्य, वैदिक वाङ्मय तथा पुराणों में शक्ति की उपासना केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के गूढ़ रहस्यों को समझने का माध्यम भी है। दुर्गा, उमा, पार्वती, गौरी, महाकाली और जगदम्बा जैसे विविध नामों में अभिव्यक्त देवी का स्वरूप वस्तुतः उसी आदिशक्ति की ओर संकेत करता है, जो समस्त चराचर जगत् में चेतना, ऊर्जा और क्रियाशीलता के रूप में विद्यमान है।

भारतीय दर्शन में सृष्टि की व्यवस्था को समझने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ उनकी शक्तियों का उल्लेख मिलता है। सरस्वती ज्ञान, वाणी और सृजनात्मक प्रतिभा की अधिष्ठात्री हैं; महालक्ष्मी समृद्धि, ऐश्वर्य, संतुलन और पालन की प्रतीक हैं; जबकि महाकाली तथा दुर्गा अन्याय, आसुरी प्रवृत्तियों और अधर्म के विनाश की शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। तथापि, शक्ति के इन स्वरूपों को केवल अलग-अलग कार्यों तक सीमित करना उचित नहीं होगा। सृजन, पालन और संहार परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि सृष्टि के सतत प्रवाह के अनिवार्य अंग हैं। इसी व्यापक अर्थ में दुर्गा-तत्त्व जीवन के संरक्षण, संतुलन और परिवर्तन की समग्र शक्ति का बोध कराता है।

जनमानस में प्रचलित मान्यता के अनुसार देवी पार्वती हिमालयराज की पुत्री हैं तथा उनका विवाह भगवान शिव से हुआ। इसी कारण वे गिरिजा, शैलपुत्री और पार्वती नामों से विख्यात हैं। किंतु संस्कृत साहित्य और वैदिक शब्द-परंपरा के आलोक में देवी के इन नामों का प्रतीकात्मक अर्थ भी विचारणीय है। वैदिक कोश तथा निरुक्त की व्याख्यात्मक परंपरा में प्रकृति, जल, मेघ और वाणी से संबंधित शब्दों के विविध अर्थों पर विचार किया गया है। इन अर्थों के आधार पर देवी के स्वरूप को प्रकृति की जीवनदायिनी शक्ति से जोड़कर देखने की एक दार्शनिक दृष्टि विकसित होती है।

जगदम्बा, जगन्माता और जगज्जननी जैसे संबोधन देवी के मातृस्वरूप को अभिव्यक्त करते हैं। माता का मूल धर्म अपनी संतान का संरक्षण, पोषण और संवर्धन करना है। इसी प्रकार प्रकृति भी समस्त जीव-जगत् को जल, अन्न, वायु और जीवनोपयोगी संसाधन प्रदान करती है। वर्षा से धरती की उर्वरता बढ़ती है, नदियाँ प्रवाहित होती हैं, वनस्पतियाँ पल्लवित होती हैं और जीव-जगत् का अस्तित्व सुरक्षित रहता है। इस दृष्टि से देवी को जगत् की माता कहना केवल श्रद्धा की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का सांस्कृतिक विधान भी है।

ऋग्वेद का मंत्र— ‘गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षती’—प्रकृति, जल और सृजन की परस्पर संबद्धता की ओर ध्यान आकर्षित करता है। इस वैदिक पद की व्याख्या विभिन्न परंपराओं में भिन्न प्रकार से की गई है। देवी के गौरी-स्वरूप को उमा अथवा दुर्गा से जोड़कर देखने वाली व्याख्यात्मक परंपरा में जल की सृजनात्मक भूमिका विशेष महत्त्व रखती है। जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। अतः मातृशक्ति का यह स्वरूप प्रकृति की उस अनिवार्य भूमिका का स्मरण कराता है, जिसके कारण पृथ्वी पर जीवन संभव होता है।

पर्वत, मेघ और प्रकृति का प्रतीकात्मक संबंध
देवी के पार्वती और गिरिजा नाम उनके हिमालय से जुड़े स्वरूप को प्रकट करते हैं। पर्वतराज हिमालय भारतीय सभ्यता में केवल भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि तपस्या, पवित्रता, स्थिरता और आध्यात्मिक उत्कर्ष का प्रतीक है। हिमालय से निकलने वाली नदियाँ भारतीय जनजीवन को पोषित करती हैं और वर्षा-चक्र तथा जल-संसाधनों के माध्यम से प्रकृति के संतुलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
वैदिक शब्दों की निरुक्तपरक व्याख्या में ‘हिम’ का संबंध जल से जोड़ा गया है। यास्क के निरुक्त में शब्दों के अर्थों की विवेचना करते हुए उनके प्रसंगगत और व्युत्पत्तिपरक आशयों को समझने का प्रयास मिलता है। हालांकि किसी शब्द का एक अर्थ उसके सभी प्रसंगों में समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता, फिर भी ऐसी व्याख्याएँ प्राचीन भारतीय मनीषा की उस प्रवृत्ति को सामने लाती हैं, जिसमें प्रकृति और आध्यात्मिक चिंतन के बीच संबंध स्थापित किया जाता था।

देवी के मातृस्वरूप के साथ मेघ, वर्षा, पर्वत और जल की प्रतीकात्मक संबद्धता इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है। मेघ वर्षा के माध्यम से धरती को जीवन देता है, जबकि पृथ्वी उस जीवन को धारण करती है। भारतीय काव्य और धार्मिक परंपरा में प्रकृति के इन तत्त्वों को स्त्री-पुरुष, माता-पिता तथा शिव-शक्ति के प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त किया गया है। यह प्रतीकात्मकता प्रकृति की परस्पर निर्भर शक्तियों को समझने का एक सांस्कृतिक माध्यम है।

भारतीय दर्शन में शिव और शक्ति का संबंध अत्यंत गूढ़ तथा महत्त्वपूर्ण है। शिव को चेतना और शक्ति को उसकी क्रियाशील अभिव्यक्ति के रूप में समझने की परंपरा शैव एवं शाक्त दर्शन में विशेष स्थान रखती है। शिव के बिना शक्ति की कल्पना और शक्ति के बिना शिव की अभिव्यक्ति अधूरी मानी जाती है। दोनों का संबंध विरोध का नहीं, बल्कि परस्पर पूरकता और अभिन्नता का है।

महाभारत के अनुशासन पर्व में शिव और उमा के स्वरूप तथा समस्त जगत् में उनकी व्यापकता से संबंधित विचार मिलते हैं। इस दार्शनिक दृष्टि के अनुसार, समस्त चराचर जगत् शिव और उमा की संयुक्त सत्ता से व्याप्त है। यहाँ शिव और शक्ति को केवल दो आराध्य व्यक्तित्वों के रूप में नहीं, बल्कि अस्तित्व के दो परस्पर संबद्ध आयामों के रूप में भी देखा जा सकता है। यही कारण है कि भारतीय उपासना-पद्धति में शिव के साथ उमा, पार्वती अथवा दुर्गा की आराधना का विशेष महत्त्व है। यह विचार भारतीय संस्कृति में स्त्री और पुरुष के परस्पर पूरक स्वरूप को भी रेखांकित करता है। सृष्टि का संतुलन तभी संभव है, जब चेतना और क्रिया, विचार और व्यवहार तथा संकल्प और सामर्थ्य एक-दूसरे के साथ समन्वित हों। शिव-शक्ति का दर्शन इसी समन्वय का आध्यात्मिक प्रतिपादन करता है।

‘त्र्यम्बकं यजामहे’ : वैदिक मंत्र का दार्शनिक संदर्भ
यजुर्वेद में प्रचलित ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ मंत्र भगवान रुद्र की उपासना से संबंधित प्रसिद्ध वैदिक मंत्र का आरंभिक अंश है। इसका विस्तृत पाठ ऋग्वेद के सातवें मंडल में भी मिलता है। यह मंत्र सामान्यतः महामृत्युंजय मंत्र के नाम से प्रसिद्ध है और इसमें आरोग्य, कल्याण तथा मृत्यु के बंधन से मुक्ति की प्रार्थना निहित है।
‘त्र्यम्बक’ शब्द की व्याख्या सामान्यतः तीन नेत्रों वाले भगवान शिव के रूप में की जाती है। इसके अतिरिक्त वैदिक और ब्राह्मण साहित्य में शब्दों के विशिष्ट निर्वचन भी मिलते हैं। सामवेद की षड्विंश ब्राह्मण परंपरा से संबंधित व्याख्या में ‘अम्बा’ शब्द तथा शिव के साथ उमा की संबद्धता के आधार पर ‘त्र्यम्बक’ पद को समझने का प्रयास किया गया है। इस प्रसंग में सायणाचार्य का भाष्य भी उल्लेखनीय है। तथापि, इस निर्वचन को शब्द का सर्वमान्य अर्थ मानने के बजाय वैदिक व्याख्या-परंपरा की एक विशिष्ट व्याख्या के रूप में ग्रहण करना अधिक समीचीन होगा। इस मंत्र का दार्शनिक महत्त्व केवल शब्दार्थ तक सीमित नहीं है। भगवान रुद्र की उपासना के माध्यम से मनुष्य जीवन की क्षणभंगुरता, मृत्यु की अनिवार्यता और उससे परे स्थित आध्यात्मिक मुक्ति के प्रश्नों पर विचार करता है। शिव का कल्याणकारी स्वरूप भय, बंधन और अज्ञान से मुक्ति की प्रेरणा देता है। जब शिव को उमा सहित देखा जाता है, तब यह स्वरूप चेतना और सृजनात्मक शक्ति के समन्वय का व्यापक प्रतीक बन जाता है।
आज के समय में दुर्गा-तत्त्व का महत्त्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों अथवा पर्व-उत्सवों तक सीमित नहीं है। यह अन्याय के प्रतिरोध, निर्बल के संरक्षण, ज्ञान के प्रसार, प्रकृति के संवर्धन और मानवीय गरिमा की रक्षा का संदेश भी देता है। देवी के विभिन्न स्वरूप हमें स्मरण कराते हैं कि शक्ति का वास्तविक औचित्य लोककल्याण में है। जो सामर्थ्य सृजन को प्रोत्साहित करे, जीवन का संरक्षण करे और अधर्म के विरुद्ध खड़ी हो, वही कल्याणकारी शक्ति है। दुर्गा की उपासना का मर्म तभी सार्थक होगा, जब समाज में नारी के सम्मान, शिक्षा, सुरक्षा और स्वावलंबन को वास्तविक महत्त्व दिया जाए। प्रकृति को माता मानने की परंपरा तभी पूर्ण होगी, जब जल, वन, पर्वत और पर्यावरण के संरक्षण के प्रति हमारा आचरण भी उत्तरदायी बने। इसी प्रकार शिव-शक्ति की अभिन्नता का दर्शन तभी जीवनोपयोगी होगा, जब हम समाज में सहयोग, संतुलन और पारस्परिक सम्मान की भावना को विकसित करें।

अंततः, ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ और दुर्गा-तत्त्व का व्यापक विमर्श भारतीय आध्यात्मिक चिंतन की उस अखंड परंपरा का परिचायक है, जिसमें उपासना के साथ दर्शन, श्रद्धा के साथ विवेक और शक्ति के साथ लोकमंगल का समन्वय दिखाई देता है। दुर्गा केवल संहार की अधिष्ठात्री नहीं, बल्कि जीवन की संरक्षिका, प्रकृति की पोषिका और धर्म की प्रतिष्ठापिका भी हैं। उनके स्वरूप का वास्तविक बोध हमें यह प्रेरणा देता है कि ज्ञान, करुणा, साहस और न्याय को जीवन में प्रतिष्ठित करके ही शक्ति की आराधना को सार्थक बनाया जा सकता है। यही श्रीदुर्गा-तत्त्व का शाश्वत संदेश है।

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