शक्ति : सृष्टि, शब्द और चेतना का सनातन आधार
उपनिषदों में वर्णित ‘एकोऽहं बहुस्याम्’ अर्थात् ‘मैं एक हूँ, अनेक हो जाऊँ’ का भाव इसी एक तत्त्व की बहुविध अभिव्यक्ति की ओर संकेत करता है। सृष्टि का वैविध्य उसी मूल सत्ता की विविध शक्तियों के कारण दृष्टिगोचर होता है
कुंवर शील वर्धन प्रताप नारायण सिंह
एडवोकेट/पत्रकार
वरिष्ठ उपाध्यक्ष
गोरखपुर प्रेस क्लब
पदार्थ की सत्ता उसकी शक्ति पर ही आधारित होती है। शक्ति से संपन्न होने पर ही कोई पदार्थ अपनी सामर्थ्य का परिचय देता है और शक्तिमान कहलाता है। आध्यात्मिक तथा लौकिक—दोनों ही दृष्टियों से शक्ति का महत्त्व सर्वोपरि है। शब्दशक्ति, काव्यशक्ति, वाक्शक्ति, इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और सैन्यशक्ति आदि उसी व्यापक शक्ति-तत्त्व के विविध आयाम हैं। भारतीय दर्शन में शक्ति केवल किसी वस्तु की कार्यक्षमता का पर्याय नहीं, बल्कि सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और परिवर्तन की मूल प्रेरणा भी है। शारदीय नवरात्रि इसी आदिशक्ति की उपासना, आराधना और उसके दार्शनिक स्वरूप को समझने का पावन अवसर है।
भारतीय चिंतन में शक्ति को ब्रह्म की अभिव्यक्ति का माध्यम माना गया है। परम तत्त्व अपनी अंतर्निहित सामर्थ्य के माध्यम से विविध रूपों में अभिव्यक्त होता है। उपनिषदों में वर्णित ‘एकोऽहं बहुस्याम्’ अर्थात् ‘मैं एक हूँ, अनेक हो जाऊँ’ का भाव इसी एक तत्त्व की बहुविध अभिव्यक्ति की ओर संकेत करता है। सृष्टि का वैविध्य उसी मूल सत्ता की विविध शक्तियों के कारण दृष्टिगोचर होता है। प्रकृति की सूक्ष्मतम क्रियाओं से लेकर ब्रह्मांड की विराट संरचना तक शक्ति की उपस्थिति का अनुभव किया जा सकता है।
विष्णुपुराण में शक्ति का स्वरूप
विष्णुपुराण में शक्ति की अदृश्य सत्ता तथा उसके कार्यरूप में प्रकट होने का उल्लेख मिलता है—
शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्या अपृथक्स्थिताः।
स्वरूपे नैव दृश्यन्ते,
दृश्यन्ते कार्यतस्तु ताः॥
—विष्णुपुराण, अंश 1, अध्याय 3, श्लोक 2
इसका भावार्थ है कि समस्त पदार्थों में विद्यमान शक्तियाँ चिंतन की सामान्य सीमाओं से परे हैं। वे अपने आश्रय से पृथक् नहीं होतीं और अपने मूल स्वरूप में प्रत्यक्ष दिखाई भी नहीं देतीं; उनका परिचय उनके कार्यों के माध्यम से प्राप्त होता है। अग्नि की दाहकता, जल की शीतलता, वायु की गतिशीलता और बीज में निहित अंकुरण की क्षमता इसके सहज उदाहरण हैं। शक्ति स्वयं दृष्टिगोचर न होते हुए भी अपने प्रभाव से अपनी उपस्थिति प्रमाणित करती है।
यही सिद्धांत आध्यात्मिक जगत में भी लागू होता है। भारतीय दर्शन के अनुसार परमात्मा की शक्ति उसके स्वरूप से अभिन्न है। जिस प्रकार चंद्रमा और उसकी चाँदनी का संबंध प्रकाश की अनुभूति कराता है, उसी प्रकार शक्ति के माध्यम से परम सत्ता की क्रियाशीलता का बोध होता है। यह उपमा दार्शनिक अर्थ में समझी जानी चाहिए, क्योंकि विभिन्न भारतीय दर्शन-परंपराएँ ब्रह्म और शक्ति के संबंध की अलग-अलग व्याख्याएँ प्रस्तुत करती हैं। शाक्त दर्शन में शक्ति को जगज्जननी तथा सृष्टि की मूल प्रेरक सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
शब्द और अर्थ के बीच शक्ति का सेतु
शक्ति का महत्त्व केवल भौतिक और आध्यात्मिक जगत तक सीमित नहीं है। भाषा तथा शब्दार्थ के संबंध में भी इसकी निर्णायक भूमिका है। हम किसी शब्द को सुनते हैं और उसके माध्यम से किसी वस्तु, भाव अथवा विचार का बोध प्राप्त करते हैं। यह प्रक्रिया तभी संभव है, जब शब्द और उसके अर्थ के बीच कोई मान्य संबंध हो। भारतीय भाषादर्शन में इसी संबंध को शब्दशक्ति के रूप में समझाया गया है।
उदाहरण के लिए, ‘घट’ शब्द सुनते ही हमारे मन में एक विशेष प्रकार के पात्र की अवधारणा उभरती है, जबकि ‘पट’ शब्द वस्त्र का बोध कराता है। यदि शब्द और अर्थ के बीच कोई निश्चित संबंध न होता, तो प्रत्येक शब्द से प्रत्येक अर्थ का बोध होने लगता। व्यवहार में ऐसा नहीं होता। अतः शब्द की अर्थबोधक क्षमता भाषा की व्यवस्था, प्रचलित परंपरा और शब्दार्थ-संबंध पर आधारित होती है।
भारतीय काव्यशास्त्र में अभिधा, लक्षणा और व्यंजना जैसी अर्थबोध की प्रक्रियाओं का विवेचन भी इसी व्यापक संदर्भ में किया गया है। शब्द केवल ध्वनियों का समूह नहीं है; वह विचार, अनुभूति और संस्कृति का संवाहक है। एक सार्थक शब्द मनुष्य के अंतर्मन को आंदोलित कर सकता है, समाज में चेतना जगा सकता है और इतिहास की दिशा बदलने की प्रेरणा भी दे सकता है। इस दृष्टि से शब्दशक्ति मानव जीवन की अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
आचार्य भर्तृहरि और शब्दब्रह्म की अवधारणा
भारतीय भाषादर्शन के महान आचार्य भर्तृहरि ने शब्द और जगत के संबंध पर गहन चिंतन किया। उनके प्रसिद्ध ग्रंथ ‘वाक्यपदीय’ में शब्दतत्त्व की अनादि सत्ता और अर्थरूप में उसकी अभिव्यक्ति का विचार मिलता है—
अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम्।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः॥
—वाक्यपदीय, ब्रह्मकाण्ड
इसका भावार्थ है कि शब्दतत्त्व अनादि और अनंत है तथा वही अर्थरूप में अभिव्यक्त होकर जगत की प्रक्रिया से संबंधित होता है। भर्तृहरि के दर्शन में शब्द केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि सत्ता, ज्ञान और अर्थबोध के गहन संबंध को समझने का माध्यम है। शब्दब्रह्म की अवधारणा भारतीय चिंतन की उस विशिष्ट परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है, जिसमें भाषा को मानवीय चेतना और विश्वबोध से जोड़कर देखा गया है।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि शब्दब्रह्म की दार्शनिक अवधारणा को सामान्य बोलचाल के शब्दों तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसका संबंध भाषा के मूल तत्त्व, अर्थ की अनुभूति और ज्ञान की प्रक्रिया से है। शब्द के माध्यम से मनुष्य अपने अनुभवों को अभिव्यक्त करता है, ज्ञान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करता है तथा सभ्यता की सांस्कृतिक स्मृतियों को सुरक्षित रखता है। इस प्रकार शब्दशक्ति ज्ञानपरंपरा की निरंतरता का आधार बनती है।
नवरात्रि : आदिशक्ति की आराधना और आत्मबोध का पर्व
नवरात्रि का पर्व शक्ति की इसी व्यापक अवधारणा को जीवन में उतारने का अवसर प्रदान करता है। दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मबल, विवेक, धैर्य, करुणा और संकल्प के जागरण का प्रतीक भी है। देवी दुर्गा का महिषासुरमर्दिनी स्वरूप अन्याय, अहंकार और आसुरी प्रवृत्तियों पर विजय का संदेश देता है। यह विजय केवल बाह्य संघर्ष की नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर उपस्थित दुर्बलताओं और नकारात्मक वृत्तियों पर नियंत्रण की भी प्रतीक है।
शक्ति का वास्तविक अर्थ केवल बाहुबल अथवा प्रभुत्व प्राप्त करना नहीं है। ज्ञान की शक्ति मनुष्य को विवेकशील बनाती है, वाणी की शक्ति सत्य को प्रतिष्ठित करती है, करुणा की शक्ति समाज को संवेदनशील बनाती है और आत्मसंयम की शक्ति व्यक्ति को अपने कर्तव्यों के प्रति सजग करती है। जब शक्ति के साथ विवेक और उत्तरदायित्व का समन्वय होता है, तभी उसका उपयोग लोककल्याण के लिए संभव होता है।
समकालीन समाज में नारीशक्ति का सम्मान, शिक्षा का प्रसार, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की रक्षा भी शक्ति की इसी सकारात्मक अभिव्यक्ति के महत्त्वपूर्ण आयाम हैं। देवी की आराधना तभी सार्थक होगी, जब समाज स्त्रियों के सम्मान, समान अवसर और सुरक्षा को अपने आचरण का अभिन्न अंग बनाए। शक्ति की उपासना का आशय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सृजनात्मक सामर्थ्य, नैतिक साहस और मानवीय संवेदना को प्रतिष्ठित करना है।
अंततः शक्ति सृष्टि की क्रियाशीलता, भाषा की अर्थवत्ता, ज्ञान की अभिव्यक्ति और मनुष्य की आत्मचेतना का महत्त्वपूर्ण आधार है। भारतीय दर्शन ने इसे विविध दृष्टियों से समझने का प्रयास किया है। नवरात्रि हमें स्मरण कराती है कि शक्ति का सर्वोच्च रूप वह है, जो अज्ञान का अंधकार दूर करे, विवेक का प्रकाश फैलाए और समाज में न्याय, समरसता तथा सद्भाव की स्थापना करे। आदिशक्ति की आराधना का वास्तविक संदेश भी यही है कि मनुष्य अपनी अंतर्निहित सामर्थ्य को पहचानकर उसका उपयोग सृजन, सेवा और लोकमंगल के लिए करे।
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