जब घर का सवाल शिक्षा और रोजगार से जुड़ जाता है
महिलाओं के लिए पानी, शौचालय और सम्मान से जुड़ी चुनौती है, जबकि रोज कमाने वाले परिवारों के लिए रोजगार और घर की जरूरतें एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं
अनीता यादव
संपादक, अनप्लग इंडिया
हर परिवार के लिए अपना एक सुरक्षित और पक्का घर होना सिर्फ रहने की जरूरत नहीं, बल्कि स्थिर जीवन की बुनियाद भी है। इसी सोच के साथ देश में प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य पात्र परिवारों को पक्के घर के साथ पानी, स्वच्छता, सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं से जोड़ना भी है।
इसके बावजूद जयपुर की रामदेव बस्ती में रहने वाले कई परिवारों के लिए आज भी पक्की छत एक इंतजार है। करीब 40 साल पुरानी इस बस्ती में लगभग 500 से 600 लोग रहते हैं। अलग-अलग सामाजिक समुदायों से आने वाले इन परिवारों की समस्याएं केवल आवास तक सीमित नहीं हैं। रोजगार, शिक्षा, साफ पानी, शौचालय और सड़क जैसी जरूरतें भी उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा हैं।
बस्ती के लोगों से बातचीत में यह भी समझ आता है कि एक ही समस्या का असर परिवार के हर सदस्य पर एक जैसा नहीं पड़ता। बच्चों के लिए यह पढ़ाई की समस्या बनती है, महिलाओं के लिए पानी, शौचालय और सम्मान से जुड़ी चुनौती है, जबकि रोज कमाने वाले परिवारों के लिए रोजगार और घर की जरूरतें एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं।
42 वर्षीय गोपाल गुर्जर बताते हैं कि यह बस्ती करीब 40 साल पुरानी है। यहां बसने से पहले लोग रेलवे स्टेशन के आसपास रहते थे, लेकिन बाद में उन्हें वहां से हटना पड़ा। इसके बाद उन्होंने वर्तमान जगह पर अपनी बस्ती बसाई। इतने लंबे समय के बाद भी इन परिवारों के पास ऐसा घर नहीं है, जिसे वे सुरक्षित और स्थायी आवास कह सकें। बरसात में पानी, गर्मी में तपती छत और सर्दियों में ठंड से बचने की मुश्किलें उनके लिए हर साल लौटकर आने वाली समस्या हैं।
59 वर्षीय खेमा राम का घर भी झोपड़ी जैसा है। उनका कहना है कि बारिश के दौरान आसपास पानी भर जाता है और घर के भीतर रहना मुश्किल हो जाता है। सड़क की उचित व्यवस्था नहीं होने से परेशानी और बढ़ जाती है। ऐसे माहौल में परिवार के बच्चों के लिए पढ़ाई करना भी आसान नहीं होता।
जब घर में जगह कम हो, बारिश के दिनों में पानी भर जाए या बाहर आने-जाने में परेशानी हो, तो बच्चों के पास पढ़ाई के लिए अनुकूल माहौल कहां से आए? जब परिवार की जिंदगी कमाई की तलाश और रहने की जगह के बीच लगातार उलझी हो, तब बच्चों की पढ़ाई नियमित रखना आसान नहीं रहता।
इसका असर लड़कियों पर भी अलग तरह से दिखाई दे सकता है। परिवार के सीमित संसाधनों के बीच जब घर और रोजी-रोटी की जरूरतें प्राथमिकता बन जाती हैं, तो लड़कियों की पढ़ाई अक्सर प्रभावित होती है। परिवार की जिम्मेदारियां भी उनके हिस्से में जल्दी आ जाती हैं।
रामदेव बस्ती की मधु राणा इसकी एक मिसाल हैं। उनका बचपन इसी बस्ती में बीता और शादी के बाद भी उनका जीवन यहीं आगे बढ़ा। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने पांचवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी। आज वह काम करके अपने परिवार की मदद करती हैं। उनका कहना है कि अगर उन्हें पढ़ाई जारी रखने का अवसर मिलता, तो वह आगे पढ़ना चाहती थीं।
मधु की कहानी यह सवाल भी खड़ा करती है कि किसी परिवार को केवल पक्का मकान मिल जाने से क्या उसके बच्चों का बेहतर भविष्य अपने आप सुनिश्चित हो जाएगा?
सुरक्षित घर जरूरी है, लेकिन उसके साथ शिक्षा, रोजगार और दूसरी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच भी उतनी ही जरूरी है।
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