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शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को गैरकानूनी हिरासत में न लें: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मेट्रो, इंटरनेट और आवाजाही पर दिए निर्देश
CJP के प्रदर्शन के बाद दिल्ली में पाबंदियों को लेकर सुनवाई, 45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश-निकास प्रतिबंधित होने और हजारों लोगों को हिरासत में लेने के आरोप, केंद्र से मंगलवार तक जवाब तलब
अनप्लग इंडिया। डेस्क
नई दिल्ली। दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के दौरान मेट्रो सेवाओं, इंटरनेट और लोगों की आवाजाही पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को अहम निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र हुए लोगों को कानून में निर्धारित प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। साथ ही दिल्ली में मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से चलाने, इंटरनेट सेवा बाधित नहीं करने तथा लोगों की आवाजाही सुचारु रखने के निर्देश दिए।
जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ ने यह सुनवाई उन याचिकाओं पर की, जिनमें आरोप लगाया गया था कि 10 अक्टूबर को प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रशासन ने अदालत के पहले के निर्देशों का पालन नहीं किया। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से जवाब और अनुपालन रिपोर्ट मांगी है। मामले पर अगली सुनवाई मंगलवार, 13 अक्टूबर को होगी।
45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध का मुद्दा उठा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान दिल्ली के 45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश या निकास प्रतिबंधित किया गया था। इससे आम लोगों और प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे लोगों को परेशानी हुई। वकीलों ने यह भी कहा कि कई लोगों को प्रदर्शन स्थल से दूर हिरासत में लिया गया।
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि मेट्रो सेवाएं सामान्य समय-सारणी के अनुसार संचालित हुईं और शनिवार रात 10 बजे तक सभी स्टेशनों को खोल दिया गया था। उन्होंने इंटरनेट सेवा बहाल होने की जानकारी भी दी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था की वास्तविक जरूरतों के तहत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह रोकना या नागरिकों की आवाजाही में अनावश्यक बाधा डालना उचित नहीं है।
हजारों लोगों की हिरासत पर उठे सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया। याचिकाओं में 6,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने का उल्लेख है, जबकि कुछ रिपोर्टों में यह संख्या 7,000 से ज्यादा बताई गई है। हिरासत में लिए गए लोगों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और अन्य प्रदर्शनकारियों के शामिल होने का दावा किया गया।
वकीलों ने पुलिस पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने और कुछ लोगों को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से पहले ही रोकने के आरोप भी लगाए। ये आरोप याचिकाकर्ताओं की ओर से लगाए गए हैं; इन पर अधिकारियों का जवाब अदालत में मांगा गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों के एकत्र होने की स्थिति में हिरासत कानून के अनुरूप ही होनी चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रतिबंध संभव हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल नागरिकों के अधिकारों को अनावश्यक रूप से बाधित करने के लिए नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट परिसर के आसपास के प्रतिबंधों पर भी निर्देश
सुनवाई के दौरान अदालत के आसपास धारा 163 लागू होने की सूचना देने वाले बोर्ड और बैरिकेडिंग का मुद्दा भी उठा। पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतों तक पहुंचने तथा वहां से बाहर निकलने में लोगों को अनावश्यक परेशानी नहीं होनी चाहिए। अदालत ने परिसर के आसपास प्रतिबंध संबंधी बोर्ड हटाने के निर्देश दिए, यदि वे अब तक नहीं हटाए गए हों।
पीठ ने अधिकारियों से बैरिकेडिंग की व्यवस्था की समीक्षा करने को भी कहा। साथ ही वकीलों और पत्रकारों को उनके पेशेवर कार्य करने से नहीं रोकने का निर्देश दिया।
CEC और मतदाता सूची संशोधन के विरोध में बुलाया गया था प्रदर्शन
CJP और कुछ अन्य संगठनों ने 10 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विरोध में प्रदर्शन का आह्वान किया था। प्रदर्शनकारियों की मांगों में चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी कथित अनियमितताओं पर जवाबदेही तय करना शामिल था।
दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी और राजधानी के कई इलाकों में सुरक्षा बढ़ाते हुए बैरिकेडिंग की थी। इसके बाद हिरासत, सार्वजनिक परिवहन पर प्रतिबंध और इंटरनेट सेवा को लेकर विवाद खड़ा हुआ।
अब सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों से पूरे मामले पर जवाब मांगा है। मंगलवार को होने वाली सुनवाई में हिरासत, पुलिस कार्रवाई और पहले दिए गए निर्देशों के अनुपालन से जुड़े मुद्दों पर आगे विचार किया जाएगा।
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