पद से नहीं जनविश्वास से बनता है जननायक
कुंवर शील वर्धन प्रताप नारायण सिंह
एडवोकेट/पत्रकार
वरिष्ठ उपाध्यक्ष
गोरखपुर प्रेस क्लब
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति सत्ता के वैभव, पद की प्रतिष्ठा अथवा बहुमत के अहंकार में नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों के नैतिक साहस, कर्तव्यनिष्ठा और जनसरोकारों के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता में निहित होती है। लोकतंत्र उन्हीं व्यक्तित्वों के बल पर जीवंत और सशक्त बना रहता है, जो उपेक्षितों की आवाज बनते हैं, जनसमस्याओं को मुखरता से उठाते हैं और विषम परिस्थितियों में भी सत्य के पक्ष में खड़े रहने का साहस रखते हैं। ऐसे जनप्रतिनिधि किसी राजनीतिक दल की सीमा में सिमटकर नहीं रह जाते, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के सजग प्रहरी के रूप में अपनी पहचान स्थापित करते हैं। गोरखपुर-अयोध्या खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के विधान परिषद सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह का राजनीतिक जीवन इसी संदर्भ में उल्लेखनीय है।
गोरखपुर जनपद के भौवापार गांव में जन्मे देवेंद्र प्रताप सिंह ने छात्र जीवन से ही सार्वजनिक गतिविधियों और सामाजिक सरोकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित की। गोरखपुर विश्वविद्यालय से विधि की शिक्षा प्राप्त करने के दौरान छात्र राजनीति में उनकी सक्रियता ने उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को आकार दिया। वर्ष 1998 में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी के रूप में पहली बार विधान परिषद सदस्य निर्वाचित होने से आरंभ हुई उनकी राजनीतिक यात्रा अनेक उतार-चढ़ावों से गुजरी। वर्ष 2004 की पराजय के बाद उन्होंने जनसंपर्क और संघर्ष का मार्ग नहीं छोड़ा। वर्ष 2010 तथा 2016-17 में विजय प्राप्त करने के पश्चात फरवरी 2023 में भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में चौथी बार विधान परिषद पहुंचना उनकी राजनीतिक सक्रियता और जनाधार का परिचायक बना।
किसी जनप्रतिनिधि की प्रतिष्ठा का निर्धारण केवल उसके निर्वाचन की संख्या से नहीं, बल्कि जनहित के प्रश्नों पर उसकी सक्रियता और समाज के प्रति उसकी जवाबदेही से होता है। शिक्षा, शिक्षक हित, कर्मचारी कल्याण, पुरानी पेंशन योजना तथा क्षेत्रीय विकास जैसे विषयों पर मुखरता ने देवेंद्र प्रताप सिंह को शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच विशिष्ट पहचान दिलाई है। जनप्रतिनिधित्व का वास्तविक अर्थ भी यही है कि सदन की कार्यवाही जनसामान्य की अपेक्षाओं से जुड़ी रहे और व्यवस्था के समक्ष उन प्रश्नों को रखा जाए, जिनसे समाज का भविष्य निर्धारित होता है।
लोकतंत्र में सच बोलना और प्रश्न करना सदैव सहज नहीं रहा है। विशेषकर तब, जब सत्ता के प्रचंड बहुमत को ही जनमत की अंतिम अभिव्यक्ति मान लिया जाए और असहमति को अनावश्यक विरोध समझने की प्रवृत्ति विकसित होने लगे। किंतु बहुमत का अर्थ निरंकुशता नहीं और असहमति का अर्थ अनुशासनहीनता नहीं होता। लोकतंत्र की सार्थकता इसी में है कि विचारों के मतभेद के बावजूद संवाद की परंपरा जीवित रहे तथा जनहित से जुड़े प्रश्नों को निर्भीकता से उठाने वालों का सम्मान किया जाए।
लोकतंत्र का सजग प्रहरी वही है, जो सत्ता की निकटता से अधिक जनता के विश्वास को महत्त्व देता है। वह गुमनाम आवाजों को अभिव्यक्ति देता है, व्यवस्था की विसंगतियों पर प्रश्न उठाता है और अपने दायित्वों के निर्वहन में व्यक्तिगत लाभ से ऊपर जनहित को स्थान देता है। ऐसा व्यक्ति विरोध और उपेक्षा के बावजूद अपने कर्तव्यपथ से विचलित नहीं होता। अंततः जनता का विश्वास ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति बनता है। देवेंद्र प्रताप सिंह के समर्थकों की दृष्टि में उनकी राजनीतिक पहचान इसी संघर्षशीलता और जनसरोकारों से निर्मित हुई है।
हाल के दिनों में राजनीतिक शिष्टाचार, संगठनात्मक मर्यादा और जनप्रतिनिधियों के पारस्परिक सम्मान को लेकर उठने वाली चर्चाएं एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती हैं। क्या संगठन में किसी पद पर आसीन हो जाना व्यक्ति को दूसरों के संघर्ष, अनुभव और योगदान की उपेक्षा करने का अधिकार दे देता है? क्या सार्वजनिक जीवन में वरिष्ठता, जनाधार और लंबे राजनीतिक अनुभव के प्रति सम्मान प्रदर्शित करना नेतृत्व की अनिवार्य जिम्मेदारी नहीं है? किसी भी राजनीतिक संगठन की मजबूती केवल उसके पदाधिकारियों की संख्या अथवा संगठनात्मक संरचना से नहीं, बल्कि उसके सदस्यों के पारस्परिक विश्वास, संवाद और आचरण की गरिमा से निर्धारित होती है।
भारतीय जनता पार्टी के क्षेत्रीय नेतृत्व से जुड़े विनोद राय के संदर्भ में भी यही अपेक्षा प्रासंगिक है कि राजनीतिक मतभेदों और संगठनात्मक दायित्वों के निर्वहन में मर्यादा एवं विवेक को सर्वोपरि रखा जाए। किसी व्यक्ति की शैक्षिक योग्यता अथवा चुनावी अनुभव पर व्यक्तिगत टिप्पणी करना स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श को आगे नहीं बढ़ाता। मूल प्रश्न यह है कि सार्वजनिक पद पर आसीन व्यक्ति अपने व्यवहार से किस प्रकार की राजनीतिक संस्कृति विकसित करता है। पद प्राप्त करना उपलब्धि हो सकती है, किंतु पद की गरिमा बनाए रखना कहीं अधिक बड़ी जिम्मेदारी है।
देवेंद्र प्रताप सिंह की राजनीतिक यात्रा को किसी वर्तमान पदाधिकारी की संगठनात्मक स्थिति के सापेक्ष सीमित करके नहीं देखा जा सकता। दशकों के सार्वजनिक जीवन में अर्जित अनुभव, निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं से विकसित संबंध और शिक्षक-कर्मचारी वर्ग के बीच स्थापित पहचान समय, श्रम तथा निरंतर संघर्ष का परिणाम होते हैं। किसी भी राजनीतिक संगठन में नए नेतृत्व का स्वागत होना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही अनुभवी जनप्रतिनिधियों के योगदान का सम्मान भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। वरिष्ठों के अनुभव से सीखना और कनिष्ठों को आगे बढ़ने का अवसर देना ही स्वस्थ राजनीतिक परंपरा का आधार है।
राजनीति में पद स्थायी नहीं होते। समय के साथ दायित्व बदलते हैं, नेतृत्व बदलता है और परिस्थितियां भी नई दिशा ग्रहण करती हैं। स्थायी वही रहता है, जो अपने आचरण, विचार और जनसेवा के माध्यम से समाज के मन में स्थान बना लेता है। अहंकार व्यक्ति की उपलब्धियों को क्षीण करता है, जबकि विनम्रता उसकी प्रतिष्ठा को व्यापक बनाती है। आसमान की ओर थूकने की कहावत इसी शाश्वत सत्य का स्मरण कराती है कि दूसरों का अनादर करने वाला व्यक्ति अंततः अपनी ही गरिमा को आहत करता है।
पूर्वांचल की राजनीतिक चेतना सदैव संघर्ष, स्वाभिमान और जनसरोकारों से प्रेरित रही है। यहां के जागरूक नागरिक अपने जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा करते हैं कि वे न केवल उनकी समस्याओं को सदन में उठाएं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में लोकतांत्रिक मर्यादाओं का भी पालन करें। देवेंद्र प्रताप सिंह के प्रति उनके समर्थकों का सम्मान इसी जनभावना का हिस्सा है। तथापि, किसी भी जनप्रतिनिधि की प्रतिष्ठा का वास्तविक आधार उसका निरंतर जनसेवा के प्रति समर्पण और अपने दायित्वों के प्रति ईमानदारी ही होता है।
लोकतंत्र की रक्षा केवल भाषणों, नारों और राजनीतिक दावों से नहीं होती। इसके लिए संवैधानिक मूल्यों के प्रति निष्ठा, असहमति के प्रति सहिष्णुता, जनसमस्याओं के प्रति संवेदनशीलता और सार्वजनिक जीवन में शालीनता आवश्यक है। राजनीति में प्रतिस्पर्धा हो, किंतु कटुता नहीं; आलोचना हो, किंतु व्यक्तिगत अपमान नहीं; मतभेद हों, किंतु संवाद के द्वार बंद न हों।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि राजनीति में पद से प्रतिष्ठा मिल सकती है, परंतु जनविश्वास अर्जित करना पड़ता है। जनता के हृदय में स्थान बनाने वाला जनप्रतिनिधि अपने संघर्ष, आचरण और सेवाभाव से पहचाना जाता है। देवेंद्र प्रताप सिंह के राजनीतिक जीवन से जुड़ी यह बहस भी इसी व्यापक संदेश को रेखांकित करती है कि लोकतंत्र की असली शक्ति पद की ऊंचाई में नहीं, जनविश्वास की गहराई में निहित होती है। सार्वजनिक जीवन में सम्मान मांगने से नहीं, अपने आचरण से अर्जित किया जाता है; और जो नेतृत्व इस सत्य को आत्मसात कर लेता है, वही लोकतांत्रिक परंपराओं को सुदृढ़ बनाने में सार्थक योगदान दे सकता है।
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