एमिटी विश्वविद्यालय में विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर मंथन, विशेषज्ञों ने कहा—मरीजों की बात सुनना ही बदलाव की पहली सीढ़ी
‘असली आवाज, असली बदलाव’ विषय पर परिचर्चा; मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता, परिवार के सहयोग और युवाओं की भूमिका पर दिया जोर
अनप्लग इंडिया। डेस्क
नोएडा। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए केवल उपचार ही नहीं, बल्कि पीड़ित व्यक्ति की बात सुनना, उसके अनुभवों को समझना और उसे बिना किसी भेदभाव के सहयोग देना भी बेहद जरूरी है। इसी संदेश के साथ एमिटी विश्वविद्यालय के एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ बिहेवियरल हेल्थ एंड एलाइड साइंसेज ने ‘विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 2026’ के अवसर पर विशेष परिचर्चा सत्र, विशेषज्ञ व्याख्यान और छात्र गतिविधियों का आयोजन किया। कार्यक्रम का मुख्य विषय ‘निजी अनुभवों को सुनना—असली आवाज, असली बदलाव’ रहा।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षाविदों, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, देखभाल करने वालों, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना कर चुके लोगों और विद्यार्थियों ने भाग लिया। परिचर्चा के दौरान मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने, मरीजों के अनुभवों को महत्व देने, रिकवरी की प्रक्रिया में परिवार और समाज की भूमिका मजबूत करने तथा मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक संवेदनशील और समावेशी बनाने पर चर्चा की गई।
कार्यक्रम का शुभारंभ एमिटी विश्वविद्यालय के डीन एजुकेशन डॉ. एसके श्रीवास्तव, एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ बिहेवियरल हेल्थ एंड एलाइड साइंसेज की निदेशक डॉ. कल्पना श्रीवास्तव तथा एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ साइकोलॉजी एंड एलाइड साइंसेज की कार्यकारी निदेशक डॉ. रंजना भाटिया ने किया।
मरीजों की बात सुनना मानसिक स्वास्थ्य देखभाल का अहम हिस्सा
कार्यक्रम के तकनीकी सत्र में दिल्ली के सेंट स्टीफंस हॉस्पिटल की सलाहकार डॉ. रूपाली शिवलकर ने ‘मानसिक स्वास्थ्य के लिए साथ आना—रिकवरी में मरीज की आवाज क्यों मायने रखती है’ विषय पर व्याख्यान दिया।
उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में मरीजों के अनुभवों और विचारों को शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया। चर्चा में बताया गया कि जब मरीजों की बात ध्यानपूर्वक सुनी जाती है और उपचार से जुड़े फैसलों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाती है, तो इससे उन्हें अपनी स्थिति समझने और रिकवरी की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाने में मदद मिल सकती है।
डॉ. रूपाली शिवलकर ने व्यक्ति-केंद्रित उपचार पद्धति, सही जानकारी के आधार पर निर्णय लेने, स्वयं की देखभाल से जुड़े कौशल विकसित करने और देखभाल करने वालों से नियमित प्रतिक्रिया लेने को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में मरीज की जरूरतों, भावनाओं और व्यक्तिगत परिस्थितियों को समझना जरूरी है।
युवाओं की भूमिका होगी महत्वपूर्ण : डॉ. एसके श्रीवास्तव
एमिटी विश्वविद्यालय के डीन एजुकेशन डॉ. एसके श्रीवास्तव ने कहा कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां महत्वपूर्ण विषय बनकर उभर रही हैं। ऐसे में युवाओं और विद्यार्थियों की भूमिका बेहद अहम हो जाती है।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय विद्यार्थियों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने पर जोर देता है। मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना और जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए जागरूकता बढ़ाना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इस तरह के कार्यक्रम विद्यार्थियों को मानसिक स्वास्थ्य के विभिन्न पहलुओं को समझने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी पहचानने का अवसर प्रदान करते हैं।
अनुभवों को साझा करने से कम हो सकता है मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा संकोच
कार्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को केवल बीमारी की पहचान और उपचार तक सीमित रखने के बजाय व्यक्ति के अनुभवों, भावनाओं और आकांक्षाओं को समझने पर भी जोर दिया गया।
विशेषज्ञों के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करने वाले लोगों और उनकी देखभाल करने वालों की बात सुनना अधिक संवेदनशील एवं समावेशी स्वास्थ्य व्यवस्था विकसित करने में मदद कर सकता है। खुलकर बातचीत करने के लिए सुरक्षित वातावरण उपलब्ध होने से लोगों को अपने अनुभव साझा करने और जरूरत पड़ने पर सहायता लेने के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है।
कार्यक्रम का उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर संवाद को बढ़ावा देना, लोगों के बीच समझ विकसित करना और उन व्यक्तियों को अपनी बात रखने का अवसर देना था, जिनके अनुभव अक्सर सामाजिक संकोच या पूर्वाग्रहों के कारण सामने नहीं आ पाते।
‘खामोश संघर्ष से साझा ताकत तक’ विषय पर पैनल चर्चा
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण ‘खामोश संघर्ष से साझा ताकत तक—हमारी खुलकर बात करने की यात्रा’ शीर्षक से आयोजित पैनल चर्चा रही। इसमें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का व्यक्तिगत अनुभव रखने वाले लोगों और देखभाल करने वालों ने अपनी यात्राओं, चुनौतियों और अनुभवों को साझा किया।
पैनल में शांति सहज ट्रस्ट की मुख्य सदस्य एवं मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोगों के समूह की सदस्य सुश्री रितु शर्मा और सुश्री राजेश्वरी अय्यर तथा सेंट थॉमस हाई स्कूल की अकादमिक प्रतिनिधि सुश्री आशा मेनन शामिल रहीं।
चर्चा के दौरान सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार, परिवार के सहयोग और सामुदायिक भागीदारी की भूमिका पर प्रकाश डाला गया। वक्ताओं ने ऐसे सुरक्षित वातावरण की आवश्यकता पर जोर दिया, जहां लोग दूसरों की आलोचना या सामाजिक प्रतिक्रिया के डर के बिना अपनी मानसिक स्थिति और अनुभवों के बारे में खुलकर बात कर सकें।
पैनल चर्चा के माध्यम से यह संदेश सामने आया कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों का सामना करने वाले लोगों को केवल सलाह देने के बजाय उनकी बात समझना और उन्हें भावनात्मक सहयोग देना भी जरूरी है।
डिजिटल युग में युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा
कार्यक्रम में ‘डिजिटल युग में मानसिक स्वास्थ्य—क्या आप युवाओं की बात सुन रहे हैं?’ विषय पर विद्यार्थियों के लिए विशेष परिचर्चा सत्र आयोजित किया गया। इसमें एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ बिहेवियरल हेल्थ एंड एलाइड साइंसेज के विद्यार्थियों ने तेजी से डिजिटल होती दुनिया में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों पर अपने विचार साझा किए।
सत्र में युवाओं के अनुभवों को सुनने, उनकी भावनाओं को समझने और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता विकसित करने के महत्व को रेखांकित किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को इस विषय पर खुलकर विचार रखने और समाज में सकारात्मक संवाद को प्रोत्साहित करने का अवसर देना था।
इस अवसर पर एमिटी सेंटर ऑफ गाइडेंस एंड काउंसलिंग की प्रमुख डॉ. हरमिंदर गुजराल भी मौजूद रहीं।
स्लोगन प्रतियोगिता, पोस्टर मेकिंग और नुक्कड़ नाटक से दिया संदेश
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के आयोजन में विद्यार्थियों की रचनात्मक भागीदारी भी देखने को मिली। छात्रों ने स्लोगन प्रतियोगिता, पोस्टर मेकिंग प्रतियोगिता और नुक्कड़ नाटक जैसी गतिविधियों के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का संदेश दिया।
इन गतिविधियों का उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों को सरल और प्रभावी तरीके से लोगों तक पहुंचाना तथा विद्यार्थियों को इस मुद्दे पर अपनी रचनात्मकता के माध्यम से विचार व्यक्त करने के लिए प्रेरित करना था।
एमिटी विश्वविद्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम ने मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में संवाद, संवेदनशीलता और व्यक्तिगत अनुभवों के महत्व को रेखांकित किया। कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में सार्थक बदलाव लाने के लिए मरीजों की आवाज को महत्व देना, परिवार और समाज का सहयोग बढ़ाना तथा युवाओं को जागरूक बनाना आवश्यक है।
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