18वीं मंजिल से गिरा 15 साल का किशोर, यशोदा मेडिसिटी के डॉक्टरों ने 2 महीने की जंग के बाद दी नई जिंदगी
Rinku Yadav
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गाज़ियाबाद के वसुंधरा का 15 वर्षीय लड़का हाइपोटेंसिव शॉक की हालत में हॉस्पिटल पहुँचा था। उसे रीढ़
की हड्डी में गंभीर चोट, कई जगह फ्रैक्चर, छाती, फेफड़े और लीवर में चोट और शरीर की त्वचा तथा ऊतकों
के काफी ज्यादा उखड़ने जैसी गंभीर चोटें आई थीं। इलाज में उसकी कई सर्जरी और रिविज़न सर्जरी हुईं
अनप्लग इंडिया। डेस्क
गाजियाबाद | गाजियाबाद के इंदिरापुरम स्थित यशोदा मेडिसिटी के डॉक्टरों ने चिकित्सा जगत में एक अभूतपूर्व चमत्कार कर दिखाया है। वसुंधरा इलाके का रहने वाला एक 15 वर्षीय किशोर, जो एक बहुमंजिला इमारत की 18वीं मंजिल से नीचे गिर गया था, लगभग दो महीने तक चले बेहद जटिल और क्रिटिकल इलाज के बाद पूरी तरह ठीक होकर अपने घर लौट आया है। इतनी ऊंचाई से गिरने के बाद इतनी गंभीर और जानलेवा चोटों से उबरकर किसी मरीज का जीवित बचना अपने आप में एक दुर्लभ चिकित्सा इतिहास है।
हाइपोटेंसिव शॉक और मल्टीपल ऑर्गन ट्रॉमा की स्थिति में लाया गया था अस्पताल
जब इस 15 वर्षीय किशोर को यशोदा मेडिसिटी के इमरजेंसी वार्ड में लाया गया, तो उसकी हालत अत्यंत नाजुक थी। अत्यधिक खून बह जाने के कारण वह हाइपोटेंसिव शॉक (जानलेवा रूप से कम ब्लड प्रेशर) की स्थिति में था। डॉक्टरों की शुरुआती जांच में पता चला कि किशोर को निम्नलिखित गंभीर चोटें आई थीं:
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- रीढ़ की हड्डी (Spine): रीढ़ की हड्डी कई जगह से टूटने के साथ-साथ अपनी जगह से पूरी तरह विस्थापित (Dislocate) हो गई थी।
- आंतरिक अंग और छाती: छाती की कई पसलियां टूटी हुई थीं, फेफड़ों में खून भर गया था (हीमोथोरैक्स) और लीवर पर गहरी चोटें आई थीं।
- फ्रैक्चर: दाहिने हाथ, बाएं पैर और नाक की हड्डी में गंभीर फ्रैक्चर थे।
- डीग्लोविंग इंजरी: कूल्हे और दाहिनी जांघ के हिस्से की त्वचा और अंदरूनी मुलायम ऊतक (सॉफ्ट टिश्यूज) बड़े पैमाने पर उखड़ चुके थे, जिसे चिकित्सा भाषा में ‘डीग्लोविंग चोट’ कहा जाता है। साथ ही सिर की त्वचा पर भी गहरा घाव था।
मरीज को तुरंत वेंटिलेटर सपोर्ट पर लिया गया और इनोट्रोपिक दवाओं तथा लगातार ब्लड व फ्लूइड ट्रांसफ्यूजन के जरिए उसकी स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास शुरू किया गया।
कई विभागों के विशेषज्ञों ने मिलकर तैयार किया ‘चरणबद्ध इलाज’
चोटों की गंभीरता को देखते हुए यशोदा मेडिसिटी में न्यूरोसर्जरी, ऑर्थोपेडिक्स, प्लास्टिक सर्जरी, क्रिटिकल केयर, रेस्पिरेटरी मेडिसिन और कार्डियोलॉजी विभाग की टीमों को मिलाकर एक मल्टी-डिसिप्लिनरी ट्रॉमा टीम का गठन किया गया। मरीज की हालत इतनी नाजुक थी कि एक साथ सभी सर्जरी करना संभव नहीं था, इसलिए डॉक्टरों ने चरणबद्ध तरीके से (Step-by-Step) इलाज करने की योजना बनाई।
परिवार की सहमति के बाद, सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रिंसिपल डायरेक्टर और यूनिट हेड डॉ. राजिंदर कुमार ने उठाया। उन्होंने पहली बड़ी प्रक्रिया के तौर पर स्पाइनल फिक्सेशन (रीढ़ की हड्डी को स्थिर करना) किया ताकि रीढ़ की हड्डी के कॉर्ड को और अधिक नुकसान होने से बचाया जा सके।
डॉ. राजिंदर कुमार ने बताया:
“यह मामला अत्यधिक जोखिम भरा था। मरीज गहरे शॉक में था और सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना था कि किस जानलेवा चोट का इलाज पहले किया जाए। अस्थिर हालत के बावजूद रीढ़ की हड्डी को सुरक्षित रखना हमारी प्राथमिकता थी। एक बार जब रीढ़ की हड्डी स्थिर हो गई, तो हम बाकी चोटों का इलाज चरण-दर-चरण कर सके, जिससे मरीज का शरीर हर प्रक्रिया को सुरक्षित रूप से झेलने में सक्षम रहा।”
ऑर्थोपेडिक और प्लास्टिक सर्जरी की जटिल प्रक्रियाएं
रीढ़ की हड्डी स्थिर होने के बाद ऑर्थोपेडिक्स, जॉइंट रिप्लेसमेंट और स्पोर्ट्स मेडिसिन के डायरेक्टर व यूनिट हेड डॉ. ब्रजेश कौशले ने कमान संभाली। उन्होंने किशोर के शरीर में मौजूद कई फ्रैक्चरों को ऑर्थोपेडिक तरीके से ठीक किया। इस लंबे दौर में कम से कम चार अतिरिक्त सुधार प्रक्रियाएं (रिवीजन प्रोसीजर्स) की गईं।
वहीं, सॉफ्ट टिश्यूज की गंभीर चोटों और त्वचा के उधड़ जाने (डीग्लोविंग) जैसी समस्या को संभालने के लिए प्लास्टिक, एस्थेटिक और रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी के प्रिंसिपल कंसल्टेंट डॉ. शोभित शर्मा ने काम किया। उन्होंने नाक के फ्रैक्चर को ठीक करने के साथ-साथ मरीज के शरीर पर बने बड़े घावों की नियमित ड्रेसिंग और रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी की।
डॉ. शोभित शर्मा ने कहा:
“नाक की हड्डी टूटने और बड़े पैमाने पर त्वचा छिलने से गहरे घाव बन गए थे। मरीज को कई अन्य जटिलताएं भी थीं, इसलिए सभी चोटों का सही तरीके से इलाज करने के लिए अलग-अलग विशेषज्ञ डॉक्टरों के बीच असाधारण तालमेल और अत्यधिक सावधानी बरतनी जरूरी थी।”
पीडियाट्रिक ICU की देखरेख में दो महीने की जंग
इलाज के इस बेहद लंबे और चुनौतीपूर्ण दौर में पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट (PICU) की टीम ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीनियर कंसल्टेंट डॉ. करण अहलूवालिया और पीडियाट्रिक इंटेंसिविस्ट कंसल्टेंट डॉ. अनुज ध्यानी की देखरेख में किशोर को लगातार क्रिटिकल केयर और संक्रमण (Infection) से बचाने के लिए विशेष उपचार दिया गया।
अस्पताल में लगभग दो महीने तक मौत से सीधी जंग लड़ने के बाद, अब इस किशोर को पूरी तरह से स्वस्थ घोषित कर अस्पताल से छुट्टी (Discharge) दे दी गई है। हालांकि, पूरी तरह सामान्य जीवन में लौटने के लिए उसे आगे भी नियमित फॉलो-अप और रिहैबिलिटेशन (पुनर्वास/फिजियोथेरेपी) की आवश्यकता होगी।
यशोदा मेडिसिटी के डॉक्टरों की यह सफलता साबित करती है कि अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीक, तेजी से हालत स्थिर करने की व्यवस्था (Trauma Management) और विभिन्न विभागों के विशेषज्ञों के बीच सटीक तालमेल से मौत के मुंह में जा चुके मरीज को भी वापस लाया जा सकता है।
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