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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी: बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना समाधान नहीं, ऑनलाइन सुरक्षा के लिए बनेगा राष्ट्रीय डेटाबेस
इस व्यवस्था का उद्देश्य ऐसी सामग्री को विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दोबारा अपलोड किए जाने पर पहचानना और उसके प्रसार को रोकना है, इसे मौजूदा सहयोग पोर्टल के अंतर्गत विकसित करने या अलग व्यवस्था बनाने पर विचार किया जा सकता है
अनप्लग इंडिया। डेस्क
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल और उनकी ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि इंटरनेट से बच्चों को पूरी तरह दूर रखना उचित रास्ता नहीं है। बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ उनकी स्वतंत्रता का भी ध्यान रखना जरूरी है। इंटरनेट पर आपत्तिजनक सामग्री की मौजूदगी के आधार पर बच्चों की पहुंच पूरी तरह रोकने के बजाय ऐसी सामग्री पर प्रभावी कार्रवाई की जानी चाहिए।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री को इंटरनेट से हटाने और उसकी दोबारा प्रसार रोकने के उपायों पर सुनवाई के दौरान ये टिप्पणियां कीं। अदालत ने केंद्र सरकार को इस दिशा में एक राष्ट्रीय डेटाबेस विकसित करने सहित कई महत्वपूर्ण कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
बच्चों के शोषण से जुड़ी सामग्री की पहचान के लिए बनेगा डेटाबेस
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि बच्चों के यौन शोषण से संबंधित प्रमाणित सामग्री की डिजिटल पहचान और उससे जुड़े इंटरनेट लिंक का रिकॉर्ड तैयार किया जाए। डेटाबेस में वास्तविक फोटो या वीडियो रखने के बजाय उनकी डिजिटल पहचान यानी हैश का इस्तेमाल किया जाएगा।
इस व्यवस्था का उद्देश्य ऐसी सामग्री को विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दोबारा अपलोड किए जाने पर पहचानना और उसके प्रसार को रोकना है। इसे मौजूदा सहयोग पोर्टल के अंतर्गत विकसित करने या अलग व्यवस्था बनाने पर विचार किया जा सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि डेटाबेस में किसी सामग्री को शामिल करने से पहले उसकी उचित जांच होनी चाहिए। इसके लिए कम से कम तीन प्रशिक्षित विशेषज्ञों की स्वतंत्र समीक्षा जरूरी होगी। शुरुआती स्तर पर सॉफ्टवेयर की मदद ली जा सकती है, लेकिन सामग्री की पुष्टि निर्धारित प्रक्रिया के तहत की जानी चाहिए।
डेटाबेस में दर्ज सूचनाओं की नियमित जांच, स्वतंत्र ऑडिट और शिकायतों के निपटारे की व्यवस्था भी सुनिश्चित करने को कहा गया है। यदि कोई सामग्री गलत तरीके से दर्ज हो जाती है, तो उसे हटाने का उचित प्रावधान होना चाहिए।
सोशल मीडिया कंपनियों के लिए रिपोर्टिंग की समयसीमा तय
अदालत ने सोशल मीडिया कंपनियों को बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री मिलने पर संबंधित पुलिस इकाई या साइबर अपराध संबंधी प्राधिकरण को सूचना देने के निर्देश दिए हैं।
निर्देशों के अनुसार, कंपनी की अपनी जांच में अज्ञात स्रोत से ऐसी सामग्री मिलने और उसे हटाए जाने की स्थिति में दो घंटे के भीतर रिपोर्ट देनी होगी। शिकायत के आधार पर सामग्री हटाए जाने पर भी रिपोर्टिंग की समयसीमा अधिकतम दो घंटे निर्धारित की गई है। वहीं, राष्ट्रीय डेटाबेस से मिलान के आधार पर हटाई गई सामग्री की जानकारी संबंधित प्राधिकरण को साप्ताहिक आधार पर देने की व्यवस्था बताई गई है।
इस व्यवस्था से ऑनलाइन अपराधों की जानकारी समय रहते जांच एजेंसियों तक पहुंचाने और आवश्यक कानूनी कार्रवाई में मदद मिलने की उम्मीद है।
शिकायत के 24 घंटे के भीतर देना होगा रेफरेंस नंबर
सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया कंपनियों की शिकायत व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने पर भी जोर दिया है। कंपनियों को अपनी वेबसाइट और ऐप पर शिकायत अधिकारी का विवरण उपलब्ध कराने के साथ बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों के लिए अलग शिकायत विकल्प देने को कहा गया है।
प्रत्येक शिकायत प्राप्त होने के 24 घंटे के भीतर शिकायतकर्ता को रेफरेंस नंबर देना होगा। शिकायतों की जांच प्रशिक्षित अधिकारियों द्वारा की जाएगी और निर्णय के साथ उसके कारण भी बताए जाएंगे।
अदालत ने केंद्र सरकार से इन व्यवस्थाओं को प्रभावी बनाने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में आवश्यक संशोधनों पर काम करने को कहा है।
नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर लग सकता है जुर्माना
अदालत ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म द्वारा कानून और निर्धारित नियमों का उल्लंघन किए जाने पर आर्थिक दंड की व्यवस्था पर विचार करने का सुझाव दिया है। जुर्माने की राशि तय करते समय उल्लंघन की गंभीरता, उसकी अवधि, बार-बार नियम तोड़ने की स्थिति और संबंधित कंपनी के आकार तथा कारोबार को ध्यान में रखने की बात कही गई है।
इसके अलावा, भुगतान आधारित और सब्सक्रिप्शन सेवाओं की भी निगरानी करने पर जोर दिया गया है, ताकि उनके माध्यम से बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री का प्रसार न हो सके। ऐसी सामग्री से अर्जित कमाई जब्त करने की संभावनाओं पर भी विचार करने को कहा गया है।
स्कूलों में बच्चों को सिखाई जाएगी डिजिटल सुरक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों को ऑनलाइन खतरों के प्रति जागरूक बनाने के लिए शिक्षा व्यवस्था की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। बच्चों को उनकी उम्र के अनुरूप यह सिखाने पर जोर दिया गया कि वे निजी जानकारी की सुरक्षा कैसे करें, अनुचित व्यवहार को कैसे पहचानें और किसी खतरे की स्थिति में शिकायत कहां करें।
अदालत ने NCERT और राज्य की शैक्षिक संस्थाओं को विशेषज्ञों की सहायता से अध्ययन सामग्री तैयार करने के लिए कहा है। इसमें सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श, सहमति, ऑनलाइन शोषण से बचाव और डिजिटल सुरक्षा जैसे विषय शामिल किए जाने पर जोर दिया गया है।
10 दिसंबर को होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देशों के क्रियान्वयन के लिए आवश्यक दिशानिर्देश और प्रक्रियाएं तैयार करने को कहा है। जरूरत पड़ने पर संबंधित कानूनों और नियमों में संशोधन करने पर भी विचार करना होगा।
केंद्र सरकार को हलफनामा दाखिल कर इन निर्देशों पर हुई प्रगति की जानकारी देनी है। मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2026 को निर्धारित है।
संपादकीय दृष्टि से अहम बात: अदालत की टिप्पणियों का मुख्य संदेश यह है कि बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह अलग करना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित डिजिटल वातावरण उपलब्ध कराना जरूरी है। इसके लिए तकनीकी निगरानी, त्वरित शिकायत निवारण, जवाबदेह सोशल मीडिया कंपनियां और बच्चों में डिजिटल जागरूकता—इन सभी पर एक साथ काम करना होगा।
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